गांवों में खेती केवल रोजगार का साधन नहीं है बल्कि लाखों परिवारों की जिंदगी का आधार है। हर मौसम किसान अपने खेत में केवल बीज नहीं बोता बल्कि अपने परिवार की उम्मीदें उसकी आय और आने वाले दिनों का भरोसा भी बोता है। लेकिन विडंबना यह है कि खेती की शुरुआत से लेकर फसल तैयार होने तक किसान को ऐसी अनेक चुनौतियों से गुजरना पड़ता है जिन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता। समय पर बीज न मिलना खेती की बढ़ती लागत मौसम की अनिश्चितता और सरकारी योजनाओं तक सीमित पहुंच उसकी परेशानियों को और बढ़ा देती है। आज छोटा किसान केवल मौसम की मार नहीं झेल रहा बल्कि व्यवस्था की खामियों से भी जूझ रहा है।
देश के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे किसानों की शिकायत है कि सरकारी बीज वितरण योजनाओं की जानकारी उन्हें समय पर नहीं मिलती। जब वे कृषि विभाग के केंद्रों तक पहुंचते हैं तब कई बार बीज का स्टॉक समाप्त हो चुका होता है। आवेदन प्रक्रिया की जटिलता तकनीकी दिक्कतें और जानकारी का अभाव भी बड़ी बाधा है। इसका सीधा असर किसान की जेब पर पड़ता है। उसे निजी दुकानों से महंगे दाम पर बीज खरीदना पड़ता है और खेती की शुरुआती लागत ही बढ़ जाती है। छोटे किसान के लिए कुछ हजार रुपये का अतिरिक्त खर्च भी मामूली नहीं होता। एक या दो एकड़ से कम जमीन वाले किसान के पास नुकसान सहने की क्षमता बहुत सीमित होती है। खेती शुरू करने के लिए भी उसे कई बार कर्ज लेना पड़ता है। फसल अच्छी हुई तो किसी तरह कर्ज उतर जाता है लेकिन मौसम ने साथ नहीं दिया तो वही कर्ज अगले मौसम तक पहुंच जाता है। इस तरह किसान धीरे-धीरे ऐसे कर्ज के चक्र में फंसता जाता है जिससे बाहर निकलना कठिन होता है।
मौसम की अनिश्चितता ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। कभी अत्यधिक वर्षा खेतों में पानी भर देती है तो कभी बारिश की कमी सूखे जैसे हालात पैदा कर देती है। तैयार फसल बर्बाद होने पर किसान का बीज खाद सिंचाई और मजदूरी पर किया गया पूरा निवेश डूब जाता है। आमदनी समाप्त हो जाती है लेकिन कर्ज और उसका ब्याज बना रहता है। ऐसी स्थिति में किसान को पुराने कर्ज की भरपाई के लिए नया कर्ज लेने की मजबूरी तक आ जाती है। सरकार ने किसानों को राहत देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत पात्र किसानों को सालाना छह हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है। इसके अलावा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन और सब-मिशन ऑन सीड्स एंड प्लांटिंग मैटेरियल के माध्यम से प्रमाणित और उन्नत बीज उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। इन योजनाओं की मौजूदगी निश्चित रूप से स्वागत योग्य है लेकिन असली सवाल इनके जमीनी क्रियान्वयन का है। किसी योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं हो सकती कि कितने किसानों का पंजीकरण हुआ या कितनी राशि वितरित की गई। वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब सबसे जरूरतमंद किसान को सही समय पर उसका लाभ मिले। आज भी दस्तावेजों की कमी आधार या बैंक खाते से जुड़ी तकनीकी दिक्कतें जानकारी का अभाव और बीज की समय पर आपूर्ति न होना अनेक किसानों के लिए बड़ी बाधा बने हुए हैं।
सबसे अधिक चिंता उन भूमिहीन और महिला किसानों को लेकर है जो खेती के काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं लेकिन जमीन उनके नाम नहीं होने के कारण कई सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पातीं। खेत में उनका श्रम दिखाई देता है लेकिन सरकारी अभिलेखों में उनकी पहचान किसान के रूप में दर्ज नहीं होती। यह स्थिति केवल प्रशासनिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक न्याय से जुड़ा विषय भी है। खेती में वास्तविक योगदान देने वाले लोगों को योजनाओं के दायरे में लाने के लिए व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और व्यावहारिक बनाने की जरूरत है।
केवल आर्थिक सहायता देकर किसान की समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया जा सकता। किसान को खेती के पूरे चक्र में सुरक्षा चाहिए। समय पर प्रमाणित बीज मिले मौसम के अनुसार वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध हो फसल बीमा की प्रक्रिया सरल हो और प्राकृतिक आपदा के बाद मुआवजा बिना अनावश्यक देरी के मिले। पंचायत स्तर पर बीज वितरण केंद्रों की निगरानी मजबूत करनी होगी। छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता के आधार पर बीज उपलब्ध कराने की व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही आवेदन प्रक्रिया इतनी सरल हो कि कम पढ़े-लिखे किसान भी बिना बिचौलियों के सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें। देश की खाद्य सुरक्षा की बुनियाद छोटे किसानों के कंधों पर टिकी है। इसलिए किसान को केवल लाभार्थी मानने के बजाय कृषि व्यवस्था का केंद्र बनाना होगा। सरकारी योजनाओं की सफलता का पैमाना लाभार्थियों की संख्या नहीं बल्कि यह होना चाहिए कि क्या सबसे कमजोर किसान तक समय पर बीज सहायता और सुरक्षा पहुंच रही है। किसान हर मौसम में खेत में उम्मीद बोता है। व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि उसकी उस उम्मीद को कागजी योजनाओं और प्रक्रियाओं की उलझनों में दम न तोड़ने दे। जब तक छोटे किसान को समय पर संसाधन और संकट के समय भरोसेमंद सहारा नहीं मिलेगा तब तक खेती को सुरक्षित और किसान की आय को स्थायी रूप से मजबूत बनाने का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।