देश पर राज कर रही मौजूदा भारतीय जनता पार्टी की सरकार और मुखिया नरेन्द्र भाई मोदी की सबसे अधिक समय तक राज करने वाली कांग्रेस व उसके नेताओं के बारे में राजनीतिक सोच चाहे जो भी हो, किंतु यह भी एक कटु सत्य है कि वह देश के प्रथम प्रधानमंत्री के शासन की लीक पर चलने का प्रयास अवश्य कर रही है, इसका सबसे ताजा उदाहरण नया राजनीतिक नारा ‘‘एक देश-एक चुनाव’’ है। आजादी के बाद चार आम चुनाव इसी नारे की लीक पर हुए, सन् 1951 से 1971 तक सारे देश में सभी चुनाव एक साथ-एक ही समय पर हुए, किंतु उसके बाद विधानसभाऐं भंग होने के कारण निर्धारित समय से पिछड़ती गई और फिर संसद व विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे और यही परम्परा आज तक जारी है, किंतु अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी और उनकी सरकार फिर नेहरू युग की परिपाटी प्रारंभ करने पर गंभीर चिंतन कर रही है और उसने अपने इस इरादे पर विचार करने के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था, जिसने अपनी सकारात्मक रिपोर्ट मोदी सरकार को सौंप दी है, अब केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने यह संकेत दिया है कि पांच साल बाद अर्थात् 2029 के संसदीय चुनाव के साथ पूरे देश की विधानसभाओं व स्थानीय निकायों के भी चुनाव हो सकते है, इसके लिए सरकार को कुछ संविधान संशोधन विधेयक संसद से मंजूर करवाना पड़ेंगे, जिसकी कि अगले शीतकालीन सत्र के लिए तैयारी शुरू कर दी गई है।
चूंकि आजादी के बाद से ही भारतीय राजनीति का मूल लक्ष्य सत्ता रही है, इसलिए इसकी प्राप्ति के लिए राजनेता अलग-अलग प्रयोग करते रहे है, इसीलिए ‘एक देश-एक चुनाव’ के मार्ग से भटक गए थे…. और इसी कारण पूरे पांच वर्ष तक देश में कहीं न कहीं चुनाव होते रहे है, जिससे देश का काफी धन और समय नष्ट होता रहा, किंतु अब प्रधानमंत्री की सार्थक सोच व पहल के साथ पुनः पुराना चुनावी युग लौटकर आने वाला है। देश के राजनीतिक पंडितों की सोच है कि चुनाव का अधिभार सत्तारूढ़ नेताओं के दिल-दिमाग पर नही होने पर वे देश के विकास व राष्ट्रीय जनहित के बारे में गंभीर चिंतन कर सकते है और देश विकास व समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
अब इसी आधार पर यह संभावना प्रकट की जाने लगी है कि चूंकि 2029 से यह कानून लागू होने वाला है, इसलिए इससे पूर्व होने वाले सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव भी उनकी अवधि में वृद्धि कर संसद के चुनाव के साथ ही कराए जाएगें, जिनमें मध्यप्रदेश की विधानसभा भी है, जिसकी मौजूदा अवधि 2028 में पूरी हो रही है। अतः उसकी भी अवधि में एक साल की वृद्धि की जा सकती है। वैसे केन्द्र द्वारा इस प्रस्ताव पर गठित कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में जो सिफारिशें की उसमें यह पहली सिफारिश ही है, जिसमें कहा गया है कि सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 2029 तक बढ़ाया जाए, लेकिन बहुमत नही मिलने और सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर बीच में भी चुनाव कराए जा सकते है, देश में ये चुनाव दो चरणों में कराए जा सकते है, पहले चरण में संसद व विधानसभाओं के चुनाव कराए जा सकते है और इसके बाद सौ दिन की अवधि में ही ग्रामीण व शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव कराए जा सकते है और जहां तक मतदाता सूची का सवाल है, इन दोनों चरणों के चुनावों के लिए एक ही मतदाता सूची रहेगी और इन दोनों चुनावों को पूरी सतर्कता व योजनाबद्ध तरीके से सम्पन्न कराया जाएगा। अब अगले कुछ ही दिनों में संसद का शीत कालीन सत्र होने वाला है, जिसमें इस बारे में पूरी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।