त्योहारों के बीच सियासी टकराव

देश में त्योहारों का मौसम सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक उल्लास का समय नहीं होता, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले व्यापारिक वर्ग के लिए पूरे साल की उम्मीदों का केंद्र होता है। दीपावली और अन्य प्रमुख पर्वों के दौरान बाजारों में दिखने वाली रौनक केवल बड़ी कंपनियों के खातों को नहीं चमकाती, बल्कि छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों, दैनिक वेतनभोगियों और उनसे जुड़े लाखों परिवारों की आजीविका को संबल प्रदान करती है। व्यापारी वर्ग पूरे साल की मेहनत और निवेश का प्रतिफल इन्हीं दिनों के कारोबार से प्राप्त करने की आस रखता है। ऐसे नाजुक समय में यदि राजनीतिक आंदोलन, चुनावी रैलियां और विरोध-प्रदर्शन बाजारों के संचालन को बाधित करने लगें, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर राजनीतिक टकराव की कीमत हमेशा आम नागरिकों और व्यापारियों को ही क्यों चुकानी पड़े?

​एक तरफ विपक्ष चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर अपने लोकतांत्रिक अधिकार का हवाला देते हुए आंदोलन और रैलियों की रणनीति बना रहा है, तो दूसरी तरफ व्यापारिक संगठन त्योहारों के मद्देनजर अपने कारोबार को निर्बाध चलाने की गुहार लगा रहे हैं। लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना, पारदर्शी चुनाव की मांग करना और संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करना विपक्ष का अधिकार ही नहीं, बल्कि कर्तव्य भी है। लेकिन किसी भी राजनीतिक आंदोलन की सफलता केवल सड़कों पर जुटी भीड़ या उससे पैदा हुए राजनीतिक दबाव से तय नहीं हो सकती; उसकी सार्थकता इस बात में भी निहित है कि उससे आम जनता का जीवन कितना प्रभावित हो रहा है।

​त्योहारों के पीक सीजन में यातायात का ठप होना, माल की आपूर्ति रुकना और ग्राहकों की आवाजाही प्रभावित होना छोटे कारोबारियों के लिए ऐसा नुकसान है, जिसकी भरपाई पूरे साल संभव नहीं होती। बड़े उद्योगपति या पूंजीपति तो कुछ समय के आर्थिक आघात को सह सकते हैं, किंतु सीमित पूंजी पर चलने वाली दुकानें, किराया, बिजली बिल, कर्मचारियों के वेतन और बैंक की किस्तों के बोझ तले दबे मध्यम और छोटे व्यापारी हर दिन की बिक्री पर निर्भर रहते हैं। इसलिए व्यापारिक संगठनों की मांगों को केवल किसी एक पक्ष के राजनीतिक विरोध के रूप में देखना भारी भूल होगी।

​इस पूरे घटनाक्रम में सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी भी उतनी ही अहम है। यदि चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर विपक्ष के मन में कोई आशंकाएं हैं या जनता के बीच भ्रम की स्थिति है, तो सरकार और संबंधित संस्थाओं को हठधर्मिता छोड़कर पारदर्शी संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। किसी संवैधानिक पद पर आसीन अधिकारी के इस्तीफे की मांग करना या उस मांग को बिना कोई स्पष्टीकरण दिए सिरे से खारिज कर देना, दोनों ही स्थितियां राजनीतिक गतिरोध को बढ़ावा देती हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर जनविश्वास बहाल करने का एकमात्र रास्ता पारदर्शी जांच, तथ्यों का सार्वजनिक प्रकटीकरण और नियमों का निष्पक्ष पालन है। ​राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि व्यापारी किसी का वोट बैंक मात्र नहीं हैं, बल्कि वे अर्थव्यवस्था के सजग प्रहरी हैं। लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी यही है कि राजनीतिक मतभेदों और सत्ता के संघर्ष के बीच आम जनता के बुनियादी अधिकार और उनकी आजीविका सुरक्षित रहे। यदि आंदोलन के समय, स्थान या मार्ग में थोड़ा बदलाव करके व्यापारिक गतिविधियों को सुरक्षित रखा जा सकता है, तो इसे किसी पक्ष की राजनीतिक हार नहीं समझा जाना चाहिए। सरकार को जहां कानून-व्यवस्था और निर्बाध व्यापार का माहौल बनाना होगा, वहीं विपक्ष को भी जिम्मेदार आचरण का परिचय देते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका विरोध प्रदर्शन आम नागरिक के पेट पर लात न मारे। आखिर लोकतंत्र की रक्षा का दावा तब तक अधूरा है, जब तक उसमें आम जनता के हितों की रक्षा न हो।