बदलती विश्व व्यवस्था में ब्रिक्स अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का आर्थिक समूह नहीं रह गया है। यह वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूती देने वाला महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। ब्राजील रूस भारत और चीन से शुरू हुए इस समूह का लगातार विस्तार हुआ है और अब इसमें 11 पूर्ण सदस्य हैं। इसका बढ़ता दायरा इस बात का संकेत है कि विकासशील देश वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अपनी प्रभावी भागीदारी चाहते हैं। भारत के लिए 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता विशेष महत्व रखती है। नई दिल्ली में होने वाला शिखर सम्मेलन भारत को समूह की प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा तय करने का अवसर देता है। भारत की अध्यक्षता का जोर लचीलापन नवाचार सहयोग और सतत विकास पर है। अब चुनौती यह है कि इन प्राथमिकताओं को केवल घोषणाओं तक सीमित न रखकर ठोस परिणामों में बदला जाए।
ब्रिक्स भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का भी महत्वपूर्ण आधार है। भारत एक ओर चीन और रूस के साथ ब्रिक्स में सहयोग करता है तो दूसरी ओर अमेरिका यूरोप जापान और अन्य देशों के साथ भी अपने संबंध मजबूत कर रहा है। यही संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति भारत की सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए ब्रिक्स को किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन के रूप में देखना उचित नहीं होगा। वैश्विक दक्षिण को अधिक प्रभावी आवाज देना ब्रिक्स का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं में विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। भारत इन संस्थाओं में सुधार की मांग करता रहा है। ब्रिक्स इस मांग को सामूहिक शक्ति देने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
आर्थिक क्षेत्र में भी भारत के लिए ब्रिक्स महत्वपूर्ण अवसर लेकर आया है। बड़े बाजारों निवेश ऊर्जा प्रौद्योगिकी और आपूर्ति शृंखला में सहयोग की संभावनाएं बढ़ी हैं। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा पार भुगतान व्यवस्था को आसान बनाने जैसे प्रयास भी आर्थिक सहयोग को नई गति दे सकते हैं। न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से बुनियादी ढांचे और सतत विकास की परियोजनाओं को वित्तीय सहयोग मिलना भी इसकी बड़ी उपलब्धि है। हालांकि ब्रिक्स के सामने चुनौतियां भी गंभीर हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद तथा रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के अलावा रूस-पश्चिम तनाव और अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता जैसे मुद्दे समूह में मतभेद पैदा कर सकते हैं। सदस्य देशों की अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं के कारण साझा सहमति बनाना भी आसान नहीं होगा। यही कारण है कि भारत को अपनी अध्यक्षता में ब्रिक्स को किसी शक्ति के विरोध का मंच बनने से बचाना होगा। इसका केंद्र आर्थिक विकास वैश्विक दक्षिण के हित और व्यावहारिक सहयोग होना चाहिए। डिजिटल ढांचा कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वास्थ्य कृषि ऊर्जा जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में ठोस परियोजनाएं शुरू करके ब्रिक्स की उपयोगिता को जमीन पर उतारा जा सकता है। ब्रिक्स की असली सफलता उसके बयानों से नहीं बल्कि उसके ठोस परिणामों से तय होगी। भारत के लिए यह मंच केवल कूटनीति का अवसर नहीं बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी स्वतंत्र और प्रभावशाली भूमिका को मजबूत करने का माध्यम है। यदि भारत सहमति संवाद और विकास को केंद्र में रखकर आगे बढ़ता है तो उसकी ब्रिक्स अध्यक्षता समूह को नई दिशा देने के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण में भारत के नेतृत्व को भी मजबूत कर सकती है।