युवाओं की खामोशी को समझना होगा

आज का युवा सपनों और महत्वाकांक्षाओं के साथ आगे बढ़ना चाहता है लेकिन बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच उसके मानसिक दबाव भी लगातार बढ़ रहे हैं। पढ़ाई में अच्छे अंक लाने की चिंता प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव करियर को लेकर असमंजस नौकरी की अनिश्चितता और परिवार की अपेक्षाएं कई बार युवाओं को भीतर से तोड़ देती हैं। इसके साथ ही सामाजिक तुलना रिश्तों की परेशानियां अकेलापन और आर्थिक चुनौतियां भी मानसिक तनाव को बढ़ा सकती हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि मानसिक परेशानी हमेशा शब्दों में सामने नहीं आती। कई युवा अपनी समस्या किसी से साझा नहीं कर पाते। वे चुप रहने लगते हैं लोगों से दूरी बनाने लगते हैं या उन गतिविधियों में रुचि खो देते हैं जिन्हें पहले पसंद करते थे। नींद और भोजन में बदलाव लगातार चिड़चिड़ापन निराशा और पढ़ाई या काम में ध्यान न लगना भी ऐसे संकेत हो सकते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

ऐसे समय में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। माता-पिता को बच्चों को केवल उनके अंकों और उपलब्धियों से नहीं आंकना चाहिए। हर परीक्षा जीवन का अंतिम फैसला नहीं है और हर असफलता भविष्य का अंत नहीं होती। बच्चों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि वे अपनी परेशानी बिना डर के परिवार से साझा कर सकते हैं। समाज और शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। विद्यालय और महाविद्यालय विद्यार्थियों के व्यवहार में होने वाले बदलावों को समझें और जरूरत पड़ने पर परिवार तथा मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मदद लें। मानसिक परेशानी को कमजोरी समझने की सोच भी बदलनी होगी। जिस तरह शारीरिक बीमारी में डॉक्टर की मदद लेना सामान्य है उसी तरह मानसिक परेशानी में परामर्शदाता या मनोचिकित्सक की सहायता लेना भी सामान्य होना चाहिए।

किसी परेशान व्यक्ति के सामने सबसे पहले सलाह रखने के बजाय उसकी बात सुनना जरूरी है। यह कहना कि सब ठीक हो जाएगा या दूसरे लोगों की परेशानी इससे बड़ी है उसकी समस्या को कम नहीं करता। उसे यह एहसास दिलाना अधिक जरूरी है कि वह अकेला नहीं है और उसकी बात को गंभीरता से सुना जा रहा है। जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता सेवाओं और विशेषज्ञों तक पहुंचाना भी आवश्यक है। आज युवाओं को यह समझाने की जरूरत है कि जीवन किसी एक परीक्षा किसी एक परिणाम किसी नौकरी या किसी रिश्ते से बड़ा है। असफलता के बाद दोबारा प्रयास किया जा सकता है रास्ता बदला जा सकता है और नई शुरुआत की जा सकती है। जरूरत केवल इतनी है कि कठिन समय में व्यक्ति खुद को अकेला न समझे। किसी की जिंदगी बचाने के लिए हमेशा कोई बड़ा अभियान जरूरी नहीं होता। कई बार एक छोटा-सा सवाल ही उम्मीद की शुरुआत बन सकता है “तुम ठीक तो हो? मन में कुछ चल रहा है तो मुझसे कह सकते हो। इसलिए युवाओं की खामोशी को सुनना होगा उनकी परेशानी को समझना होगा और जरूरत के समय उनका हाथ थामना होगा। संभव है हमारी एक संवेदनशील बातचीत किसी के जीवन में उम्मीद की नई रोशनी बन जाए।