पृथ्वी अवलोकन उपग्रह अब केवल अंतरिक्ष विज्ञान की उपलब्धि नहीं रह गए हैं बल्कि शासन व्यवस्था आपदा प्रबंधन कृषि पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण उपकरण बन चुके हैं। पृथ्वी की सतह वायुमंडल और महासागरों में होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी के लिए इनकी उपयोगिता बढ़ती जा रही है। भारत ने पृथ्वी अवलोकन के क्षेत्र में पहले ही मजबूत आधार तैयार कर लिया है। ऐसे में ईओएस-05 जैसे मिशन देश की निगरानी क्षमता को नई दिशा देने वाले हैं। पृथ्वी अवलोकन की अब तक की व्यवस्था में निम्न पृथ्वी कक्षा में घूमने वाले उपग्रहों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ये उपग्रह बेहद विस्तृत तस्वीरें उपलब्ध कराते हैं लेकिन किसी खास क्षेत्र को लगातार देखने की उनकी क्षमता सीमित होती है। इसके विपरीत भू-तुल्यकालिक कक्षा में स्थित उपग्रह बड़े क्षेत्र पर लंबे समय तक नजर रख सकते हैं। इसलिए दोनों तरह के उपग्रहों को एक-दूसरे का विकल्प नहीं बल्कि पूरक बनाकर देखना होगा। विस्तृत तस्वीरों के लिए निम्न कक्षा और निरंतर निगरानी के लिए भू-तुल्यकालिक उपग्रहों का संयोजन अधिक प्रभावी व्यवस्था तैयार कर सकता है।
इसकी सबसे बड़ी उपयोगिता आपदा प्रबंधन में दिखाई दे सकती है। चक्रवात की दिशा और तीव्रता तेजी से बदल सकती है। बाढ़ कुछ ही घंटों में बड़े क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है और जंगल की आग अचानक बेकाबू हो सकती है। ऐसे समय में लगातार प्राप्त होने वाली उपग्रह सूचनाएं प्रशासन को बदलती परिस्थितियों के अनुसार तेजी से निर्णय लेने में मदद कर सकती हैं। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का आकलन हो या जंगल की आग से हुए नुकसान का मानचित्रण लगातार निगरानी राहत और बचाव कार्यों को अधिक प्रभावी बना सकती है।
हालांकि केवल उपग्रहों से तस्वीरें प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती इन आंकड़ों को ऐसी उपयोगी सूचना में बदलने की है जिसे प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियां तत्काल इस्तेमाल कर सकें। उपग्रह से प्राप्त डेटा और जमीन पर निर्णय लेने की प्रक्रिया के बीच समय का अंतर जितना कम होगा उतना ही इसका लाभ अधिक मिलेगा। इसके लिए आधुनिक डेटा प्रोसेसिंग और मजबूत संचार व्यवस्था जरूरी है। कृषि क्षेत्र में भी पृथ्वी अवलोकन तकनीक बड़ी भूमिका निभा सकती है। विशाल कृषि क्षेत्र की जमीनी निगरानी हमेशा आसान नहीं होती। उपग्रहों की मदद से फसल की स्थिति वनस्पति भूमि उपयोग और फसल में पैदा होने वाले तनाव का आकलन किया जा सकता है। मौसम मृदा और जमीनी आंकड़ों के साथ उपग्रह डेटा को जोड़कर किसानों और नीति निर्माताओं को अधिक सटीक जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है। इस पूरी प्रक्रिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका आने वाले समय में निर्णायक हो सकती है। उपग्रहों से लगातार बड़ी मात्रा में डेटा प्राप्त होता है जिसका मैन्युअल विश्लेषण कठिन और समय लेने वाला है।
आधारित प्रणालियां बड़ी संख्या में तस्वीरों का तेजी से विश्लेषण कर असामान्य बदलावों की पहचान कर सकती हैं। इससे फसल नुकसान आपदा प्रभावित क्षेत्र वन क्षेत्र और पर्यावरणीय बदलावों का आकलन अधिक तेजी से किया जा सकेगा। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी पृथ्वी अवलोकन क्षमता का महत्व लगातार बढ़ रहा है। भारत की लंबी समुद्री सीमा और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी रणनीतिक स्थिति समुद्री गतिविधियों की निगरानी को महत्वपूर्ण बनाती है। अंतरिक्ष आधारित निगरानी से हवाई और जमीनी निगरानी प्रणालियों को भी बेहतर सूचनाएं मिल सकती हैं। समय पर और विश्वसनीय जानकारी आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था की महत्वपूर्ण जरूरत बन चुकी है। लेकिन भारत को किसी एक उपग्रह या एक तकनीक पर निर्भर रहने से बचना होगा। इसके लिए अलग-अलग कक्षाओं में उपग्रहों का मजबूत और विविध समूह तैयार करना जरूरी है ताकि किसी एक प्रणाली के अनुपलब्ध होने पर भी महत्वपूर्ण सेवाएं प्रभावित न हों। साथ ही स्वदेशी सेंसर उपग्रह प्लेटफॉर्म संचार प्रणाली और डेटा प्रोसेसिंग क्षमता में निवेश बढ़ाना होगा। ईओएस-05 को इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा माना जाना चाहिए। भारत को ऐसी एकीकृत पृथ्वी अवलोकन व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें अंतरिक्ष से मिले आंकड़ों को मौसम कृषि आपदा प्रबंधन पर्यावरण और शासन से जुड़े प्लेटफॉर्म से जोड़ा जा सके। लक्ष्य केवल उपग्रह चित्र जुटाना नहीं बल्कि उनसे ऐसी उपयोगी सूचना तैयार करना होना चाहिए जो समय पर कार्रवाई का आधार बने। वास्तव में पृथ्वी अवलोकन का भविष्य केवल अधिक उपग्रह भेजने में नहीं बल्कि अंतरिक्ष से प्राप्त आंकड़ों को जमीन पर प्रभावी निर्णय में बदलने में है। भारत यदि भू-तुल्यकालिक और निम्न पृथ्वी कक्षा वाले उपग्रहों की संयुक्त क्षमता को कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक डेटा प्रणालियों से जोड़ता है तो आपदा प्रबंधन से लेकर कृषि और राष्ट्रीय सुरक्षा तक अनेक क्षेत्रों में बड़ा बदलाव संभव है।