संसद में शोर नहीं संवाद चाहिए

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संसद है। संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं बल्कि जनता की आकांक्षाओं समस्याओं और देश की दिशा तय करने का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। सत्ता पक्ष को जहां जनादेश के आधार पर सरकार चलाने की जिम्मेदारी मिली है वहीं विपक्ष का दायित्व सरकार की नीतियों की समीक्षा करना सवाल उठाना और जनहित में सुधार के सुझाव देना है। ऐसे में संसद का सुचारु संचालन लोकतंत्र की मजबूती के लिए बेहद जरूरी है। दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में संसद का कामकाज बार-बार हंगामे और गतिरोध की भेंट चढ़ता रहा है। विपक्ष किसी मुद्दे पर चर्चा की मांग करता है और सत्ता पक्ष विपक्ष पर सदन बाधित करने का आरोप लगाता है। नतीजा यह होता है कि प्रश्नकाल प्रभावित होता है महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो पाती और संसद का बहुमूल्य समय नष्ट होता है। इसका सीधा नुकसान जनता को होता है। लोकतंत्र में असहमति का अपना महत्व है। सरकार के निर्णयों पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार ही नहीं बल्कि जिम्मेदारी भी है। लेकिन विरोध का अर्थ सदन को ठप करना नहीं हो सकता। इसी तरह सत्ता पक्ष का बहुमत उसे विपक्ष की आवाज अनसुनी करने का अधिकार नहीं देता। बहुमत सरकार बनाने के लिए जरूरी है लेकिन लोकतंत्र चलाने के लिए संवाद और सहमति भी उतनी ही जरूरी है।

संसद में बेरोजगारी महंगाई किसानों की समस्याएं शिक्षा स्वास्थ्य राष्ट्रीय सुरक्षा पर्यावरण डिजिटल अपराध आर्थिक असमानता और नई तकनीक से जुड़ी चुनौतियों जैसे अनेक गंभीर विषयों पर चर्चा होनी चाहिए। जनता अपने प्रतिनिधियों को नारेबाजी और हंगामे के लिए नहीं बल्कि समस्याओं का समाधान खोजने के लिए संसद भेजती है। यदि जनहित के मुद्दे राजनीतिक टकराव के शोर में दब जाएं तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा भी जरूरी है। संसद से पारित कानूनों का असर वर्षों तक देश और समाज पर पड़ता है। इसलिए कानून बनाने की प्रक्रिया में व्यापक बहस विशेषज्ञों की राय और विपक्ष के सुझावों को पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए। जल्दबाजी में बनाए गए कानून भविष्य में व्यावहारिक कठिनाइयों को जन्म दे सकते हैं। संसद का समय जनता के धन से चलता है। जब लगातार हंगामे के कारण कार्यवाही स्थगित होती है तो केवल समय और धन की बर्बादी नहीं होती बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही भी कमजोर होती है। सांसदों को यह समझना होगा कि सदन का प्रत्येक मिनट देश की जनता की उम्मीदों से जुड़ा है। संसदीय गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की है। सर्वदलीय बैठकों को प्रभावी बनाया जाना चाहिए। संसदीय समितियों को अधिक मजबूत किया जाना चाहिए। प्रश्नकाल और शून्यकाल की गरिमा बनाए रखनी चाहिए तथा सदन की कार्यवाही बाधित करने वालों पर नियमों के अनुसार निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। नियम सभी दलों और सभी सांसदों पर समान रूप से लागू होने चाहिए।

संसद में सत्ता और विपक्ष राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं लेकिन उन्हें एक-दूसरे का शत्रु नहीं बनना चाहिए। चुनावी संघर्ष अपनी जगह है लेकिन संसद में राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। बहुमत को संवाद का विकल्प नहीं बनाया जा सकता और विपक्ष को विरोध के नाम पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को ठप करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। जनता की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मतदाताओं को अपने सांसदों के संसदीय प्रदर्शन पर नजर रखनी चाहिए। उन्हें यह सवाल पूछना चाहिए कि उनके प्रतिनिधि ने संसद में कितने सवाल उठाए कितनी बहस में हिस्सा लिया और क्षेत्र की समस्याओं को कितनी गंभीरता से उठाया। जब जनता नारे और आरोपों के बजाय काम और जवाबदेही को महत्व देगी तब राजनीतिक दलों पर भी बेहतर प्रदर्शन का दबाव बनेगा। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारी संसद का आचरण देश के भीतर ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय लोकतंत्र की तस्वीर पेश करता है। इसलिए संसद को टकराव का अखाड़ा नहीं बल्कि विचारों और तर्कों का मंच बनाना होगा। आज जरूरत ऐसी संसद की है जहां असहमति हो लेकिन कटुता न हो। विरोध हो लेकिन अवरोध न हो। सत्ता जवाब दे और विपक्ष समाधान प्रस्तुत करे। संसद में शोर जितना कम होगा संवाद उतना मजबूत होगा और लोकतंत्र उतना ही प्रभावी बनेगा। संसद का गतिरोध किसी एक दल की समस्या नहीं बल्कि पूरे लोकतंत्र की चिंता है। सत्ता और विपक्ष दोनों को याद रखना होगा कि वे जनता के प्रतिनिधि हैं। देश की जनता उनसे हंगामा नहीं समाधान चाहती है। लोकतंत्र की असली पहचान यही होगी कि संसद में शोर नहीं संवाद हो और राजनीतिक हितों से ऊपर राष्ट्रहित को स्थान मिले।