भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर खड़े हुए गंभीर सवाल

मध्य-पूर्व में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को झकझोर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और समुद्री आवागमन पर असर के कारण दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो गई है जिसका सबसे ज्यादा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर दिख रहा है। देश में रसोई गैस यानी एलपीजी का संकट अब संसद से लेकर सड़कों तक चर्चा का विषय बन गया है। कई शहरों में गैस एजेंसियों पर लंबी कतारें लग रही हैं जबकि कमर्शियल सिलेंडरों की कमी से होटल और रेस्टोरेंट प्रभावित हो रहे हैं। कालाबाजारी की शिकायतें भी लगातार सामने आ रही हैं। वैश्विक ऊर्जा मानचित्र में होर्मुज जलडमरूमध्य की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री मार्ग दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा चोकपॉइंट है जहां से करीब 20 प्रतिशत वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति गुजरती है। सऊदी अरब कतर संयुक्त अरब अमीरात कुवैत और इराक जैसे बड़े निर्यातक इसी मार्ग पर निर्भर हैं। ऐसे में क्षेत्र में तनाव बढ़ते ही ऊर्जा आपूर्ति अस्थिर हो जाती है। मौजूदा हालात में ईरान की चेतावनियों के चलते कई टैंकर रुक गए हैं जिससे एलपीजी और एलएनजी की सप्लाई बाधित हुई है। भारत के लिए यह संकट इसलिए गंभीर है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। देश में हर साल 3 करोड़ टन से अधिक एलपीजी की खपत होती है लेकिन घरेलू उत्पादन इसका आधा भी पूरा नहीं कर पाता। अनुमान है कि भारत की 80 से 90 प्रतिशत एलपीजी सप्लाई होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आती है। ऐसे में इस मार्ग में व्यवधान का सीधा असर भारतीय रसोई पर पड़ा है।

दिलचस्प बात यह है कि पेट्रोल और डीजल की स्थिति अपेक्षाकृत सामान्य बनी हुई है। भारत ने पिछले वर्षों में कच्चे तेल के आयात को विविध स्रोतों से जोड़कर मजबूत किया है। आज देश रूस अमेरिका और अफ्रीकी देशों समेत 40 से अधिक स्रोतों से तेल खरीदता है। इसके अलावा देश के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी मौजूद हैं जिससे तत्काल संकट का असर कम होता है।इसके उलट एलपीजी के मामले में स्थिति कमजोर है। इसे सुरक्षित रखने के लिए विशेष टैंक और उच्च दबाव की जरूरत होती है जिससे बड़े स्तर पर भंडारण मुश्किल और महंगा होता है। यही कारण है कि भारत में एलपीजी का भंडार केवल कुछ दिनों की खपत के बराबर ही है। आयात में थोड़ी भी बाधा तुरंत संकट में बदल जाती है।

पिछले वर्षों में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों परिवारों को गैस कनेक्शन दिए गए जिससे एलपीजी की मांग तेजी से बढ़ी है। जहां 2014 में लगभग 14 करोड़ कनेक्शन थे वहीं अब यह संख्या 33 करोड़ से अधिक हो चुकी है। इससे स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार तो हुआ लेकिन निर्भरता भी बढ़ गई है। संकट का असर उद्योगों और छोटे व्यवसायों पर भी साफ दिख रहा है। होटल रेस्टोरेंट और छोटे कारोबारी गैस की कमी से जूझ रहे हैं। सरकार ने फिलहाल रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने और वैकल्पिक स्रोतों से आयात करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देने के लिए कमर्शियल सिलेंडरों की आपूर्ति सीमित की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट भारत की ऊर्जा नीति की कमजोरियों को उजागर करता है। कच्चे तेल के लिए जहां रणनीतिक भंडार बनाए गए वहीं एलपीजी और गैस के लिए ऐसी दीर्घकालिक तैयारी नहीं की गई। भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए गैस भंडारण क्षमता बढ़ाना पाइप्ड नेचुरल गैस नेटवर्क का विस्तार करना और ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण बेहद जरूरी होगा।

मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष कब खत्म होगा यह स्पष्ट नहीं है लेकिन इस संकट ने यह साफ कर दिया है कि वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था जितनी व्यापक है उतनी ही नाजुक भी। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो हर अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर भारत की रसोई और अर्थव्यवस्था पर इसी तरह पड़ता रहेगा।