दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां शक्ति संतुलन की पुरानी संरचनाएं टूट रही हैं और नई विश्व व्यवस्था अभी स्थिर रूप नहीं ले सकी है। ऐसे समय में अमेरिका इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय टकराव नहीं बल्कि वैश्विक असंतुलन का संकेत है। जब महाशक्तियां प्रत्यक्ष या परोक्ष युद्ध की राह चुनती हैं तब उसका प्रभाव सीमाओं से परे जाकर पूरी मानवता पर पड़ता है। ऊर्जा बाजार आपूर्ति श्रृंखलाएं मुद्रा विनिमय दरें शेयर बाजार खाद्य सुरक्षा और कूटनीतिक समीकरण सब अनिश्चितता के घेरे में आ जाते हैं।
मध्यपूर्व में किसी भी बड़े संघर्ष का पहला असर तेल आपूर्ति पर पड़ता है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है तो तेल कीमतों में उछाल स्वाभाविक है। भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश के लिए यह दोहरी चुनौती है। आयात बिल बढ़ता है और महंगाई के साथ राजकोषीय दबाव भी बढ़ता है। कच्चे तेल के दाम बढ़ने का असर परिवहन उर्वरक बिजली और विनिर्माण लागत पर पड़ता है जिसका सीधा बोझ आम नागरिक पर आता है।
यह संघर्ष केवल आर्थिक नहीं बल्कि भू राजनीतिक और वैचारिक भी है। यूक्रेन संकट के बाद दुनिया पहले ही ध्रुवीकरण की ओर बढ़ चुकी है। यदि पश्चिम एशिया में स्थायी अस्थिरता गहराती है तो दक्षिण एशिया सहित वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए संतुलन साधना कठिन होगा। भारत की स्थिति विशेष रूप से जटिल है क्योंकि उसके रणनीतिक संबंध अमेरिका और यूरोपीय देशों से भी हैं और ऐतिहासिक ऊर्जा संबंध ईरान से भी। साथ ही इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। ऐसे में किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़े होना भारत की बहुस्तरीय विदेश नीति के लिए चुनौती बन सकता है।
भारत की चिंता केवल कूटनीतिक नहीं मानवीय भी है। मध्यपूर्व में लगभग 90 लाख भारतीय कार्यरत हैं। यदि युद्ध का दायरा बढ़ता है तो उनकी सुरक्षा और भारत को मिलने वाली प्रेषण राशि दोनों प्रभावित हो सकती हैं। लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में समुद्री मार्गों पर तनाव बढ़ने से व्यापार महंगा होगा और विकास की गति पर दबाव आएगा। ऐसे समय में भारत की भूमिका केवल एक प्रभावित राष्ट्र की नहीं बल्कि संभावित संतुलनकर्ता की भी हो सकती है। भारत इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है जिसमें ईरान भी सदस्य है। यह मंच वैश्विक दक्षिण की आवाज को सशक्त करने का अवसर देता है। यदि भारत इस मंच के माध्यम से युद्धविराम और संवाद की पहल करता है तो वह वैश्विक स्थिरता में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
दूसरी ओर दक्षिण एशिया में भी चुनौतियां कम नहीं हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ता तनाव क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा सकता है। यदि पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया दोनों क्षेत्रों में उथल पुथल बढ़ती है तो भारत को दो मोर्चों पर सतर्क रहना होगा। आतंकवाद कट्टरता और अवैध हथियारों का प्रसार ऐसे वातावरण में तेज हो सकता है। समाधान स्पष्ट है। युद्धविराम और बहुपक्षीय संवाद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाया जाना चाहिए ताकि तेल निर्भरता कम हो। वैश्विक संस्थाओं में सुधार आवश्यक है ताकि वे न्यायपूर्ण और प्रभावी मंच बन सकें। जी-20 और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
इतिहास साक्षी है कि युद्ध स्थायी समाधान नहीं देता। शक्ति प्रदर्शन से क्षणिक विजय मिल सकती है किंतु स्थायी शांति केवल संवाद और सहयोग से आती है। नई बनती दुनिया को यदि मानवीय और स्थिर बनाना है तो उसे हथियारों की दौड़ से आगे बढ़कर सहअस्तित्व की संस्कृति अपनानी होगी। भारत अपनी संतुलित और स्वायत्त विदेश नीति के माध्यम से शांति का सेतु बन सकता है। समय की मांग है कि विश्व नेतृत्व युद्ध की भाषा छोड़कर शांति की भाषा सीखे क्योंकि बदलती दुनिया की अनिवार्य अपेक्षा अब केवल और केवल शांति है।