दिल्ली आबकारी नीति प्रकरण: बरी शब्द से परे न्यायिक जवाबदेही और क्षतिपूर्ति की अनिवार्यता

दिल्ली आबकारी नीति प्रकरण में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया सहित 23 आरोपितों को 27 फरवरी 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के बाद देश में न्यायिक जवाबदेही अभियोजन की गुणवत्ता और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की सीमाओं पर गंभीर बहस प्रारंभ हो गई है। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य आरोपों को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं थे और कथित साजिश की थ्योरी अनुमान पर आधारित थी। यह फैसला केवल एक आपराधिक मुकदमे का समापन नहीं बल्कि न्याय प्रणाली की कार्यप्रणाली पर व्यापक चिंतन का अवसर भी है।

भारत सहित विश्व के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में आपराधिक न्याय प्रणाली बहुस्तरीय और प्रक्रिया प्रधान है। निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक साक्ष्यों की सूक्ष्म जांच विधि के शासन की रक्षा के लिए आवश्यक है। किंतु जब यही प्रक्रिया वर्षों तक चलती है और अंततः आरोपी निर्दोष सिद्ध होता है तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उसके जीवन के वे वर्ष जो मुकदमे और कारावास में बीत गए उनकी भरपाई कौन करेगा। सामाजिक प्रतिष्ठा का ह्रास आर्थिक क्षति मानसिक आघात और राजनीतिक प्रभाव जैसे आयाम केवल एक बरी शब्द से समाप्त नहीं हो जाते।

अदालत की टिप्पणियों से यह भी संकेत मिला कि जांच और अभियोजन की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं। यदि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का नाम बिना ठोस साक्ष्य के जोड़ा जाता है तो यह विधिक सिद्धांतों के विपरीत है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जांच अधिकारी के विरुद्ध विभागीय जांच के निर्देश यह दर्शाते हैं कि न्यायालय जवाबदेही सुनिश्चित करना चाहता है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और पेशेवर दक्षता सुनिश्चित की जाए ताकि भविष्य में कमजोर साक्ष्यों पर आधारित आरोप न्यायालय तक न पहुँचें।

इस प्रकरण ने न्यायिक आरोपों और राजनीतिक परिणामों के संबंध पर भी गंभीर प्रश्न खड़ा किया है। आरोप लगने के दौरान व्यापक मीडिया कवरेज और राजनीतिक विमर्श सार्वजनिक धारणा को प्रभावित करते हैं। यदि बाद में अदालत आरोपों को खारिज कर दे तो पूर्व में हुई सामाजिक और राजनीतिक क्षति की भरपाई व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाती है। लोकतंत्र में आरोप और जांच सामान्य प्रक्रिया हैं परंतु उनकी गुणवत्ता और निष्पक्षता ही व्यवस्था की विश्वसनीयता तय करती है।

भारत में यद्यपि संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है और न्यायालय कुछ मामलों में क्षतिपूर्ति प्रदान करते रहे हैं फिर भी निर्दोष सिद्ध व्यक्तियों के लिए समग्र राष्ट्रीय क्षतिपूर्ति कानून का अभाव स्पष्ट है। अनेक देशों में गलत अभियोजन या न्यायिक त्रुटि की स्थिति में मुआवजे की व्यवस्था है जिससे न्याय केवल निर्णय तक सीमित न रहकर पुनर्स्थापन तक विस्तारित होता है। भारत में भी ऐसी नीति पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है जिसमें कानूनी खर्च की प्रतिपूर्ति प्रतिष्ठा की सार्वजनिक बहाली मानसिक स्वास्थ्य सहायता और अनावश्यक अपीलों पर नियंत्रण जैसे प्रावधान सम्मिलित हों।

न्याय केवल दोष या निर्दोष तय करने का माध्यम नहीं बल्कि राज्य और नागरिक के बीच विश्वास का आधार है। यदि कोई व्यक्ति वर्षों बाद निर्दोष सिद्ध होता है तो न्याय का अर्थ यह भी होना चाहिए कि उसकी सामाजिक आर्थिक और मानसिक क्षति की भरपाई सुनिश्चित की जाए। दिल्ली आबकारी नीति प्रकरण ने यह अवसर दिया है कि नीति निर्धारक एक सशक्त जवाबदेही और क्षतिपूर्ति तंत्र विकसित करें ताकि भविष्य में किसी भी नागरिक को न्यायिक प्रक्रिया की लंबी यात्रा में अपने जीवन का अमूल्य समय अनावश्यक रूप से न गंवाना पड़े। न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता तभी सुदृढ़ होगी जब वह अपनी त्रुटियों को स्वीकार कर उनके निवारण की स्पष्ट और प्रभावी व्यवस्था भी स्थापित करे।