दिल्ली की कथित शराब नीति घोटाला मामले में अदालत द्वारा 23 आरोपितों को बरी किए जाने का फैसला केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि देश की राजनीति और जांच एजेंसियों की भूमिका पर भी व्यापक विमर्श का अवसर है। यह मामला शुरुआत से ही राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, जांच की दिशा और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर चर्चा में रहा है। इस विवाद में महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें एक सिटिंग मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को जेल जाना पड़ा था। कहने का आशय यह है कि जब कोई सबूत था ही नहीं तो कै से एक राजनीति पार्टी को खत्म करने का कार्य किया गया।
दिल्ली सरकार की 2021-22 की आबकारी नीति को लेकर यह आरोप लगा कि लाइसेंस देने और राजस्व संरचना में बदलाव के जरिए कुछ निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाया गया। जांच एजेंसियों ने इसे कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का मामला बताया। इसके बाद गिरफ्तारियां, लंबी पूछताछ और राजनीतिक बयानबाजी का दौर चला।अब अदालत के फैसले ने यह संकेत दिया है कि प्रस्तुत साक्ष्य आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है— संदेह का लाभ आरोपी को। ऐसे में बरी होना इस सिद्धांत की पुष्टि भी है।
इस फैसले से आम आदमी पार्टी को निश्चित ही नैतिक और राजनीतिक बल मिलेगा। विपक्ष लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। अदालत का यह निर्णय उन आरोपों को नई धार दे सकता है।
वहीं, केंद्र और जांच एजेंसियों के लिए यह आत्ममंथन का क्षण है—क्या जांच की दिशा, साक्ष्यों की गुणवत्ता और अभियोजन की रणनीति पर्याप्त रूप से ठोस थी?इस पूरे प्रकरण में न्यायपालिका ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि अंतिम निर्णय अदालत के हाथ में होता है, न कि राजनीतिक मंचों पर चल रही बहसों में। यह लोकतंत्र के उस स्तंभ की मजबूती को दर्शाता है, जो आरोपों और प्रत्यारोपों से परे तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित निर्णय देता है।
हालांकि बरी होना कानूनी राहत है, लेकिन यह भी जरूरी है कि नीति निर्माण की प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेह हो। भविष्य में ऐसी परिस्थितियां न बनें, इसके लिए सरकारों को स्पष्ट नियम, पारदर्शी निविदा प्रक्रिया और स्वतंत्र ऑडिट तंत्र को और मजबूत करना होगा।
शराब नीति प्रकरण ने यह सिखाया है कि लोकतंत्र में आरोप लगाना आसान है, पर उन्हें साबित करना कठिन। अंतत: कानून की कसौटी पर वही टिकता है, जो तथ्यों और साक्ष्यों से पुष्ट हो। अदालत का यह फैसला राजनीतिक हलकों में चाहे जितनी हलचल पैदा करे, पर लोकतंत्र के लिए यह संदेश स्पष्ट है—न्याय की प्रक्रिया धीमी हो सकती है, पर निर्णायक वही होती है।लोकतंत्र में न्यायपालिका की स्वतंत्रता सर्वोपरि है। अदालत का निर्णय यह संदेश देता है कि केवल आरोप या राजनीतिक दबाव किसी को दोषी नहीं ठहरा सकते; ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं। यदि जांच एजेंसियां पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकीं, तो यह उनकी पेशेवर क्षमता और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न है। साथ ही, यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी भी नीति में पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य होती है। सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी नीतियां न केवल कानूनी रूप से सुदृढ़ हों, बल्कि नैतिक दृष्टि से भी स्पष्ट हों।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह फैसला आम आदमी पार्टी के लिए नैतिक बढ़त का अवसर बन सकता है। विपक्ष पर राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप और मुखर होंगे। वहीं केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों को अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आत्ममंथन करना होगा। बार-बार ऐसे मामलों का अदालत में टिक न पाना जनता के मन में अविश्वास पैदा करता है। सौरभ वार्ष्णेय
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है, समाचार पत्र पत्रिकाओं में विचारक है।