लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर और चिंताजनक संकेत है। लोकतंत्र केवल शासन व्यवस्था नहीं बल्कि संवाद सहमति असहमति के सम्मान और संस्थागत विश्वास पर टिकी हुई एक सशक्त परंपरा है। संसद इस व्यवस्था का सर्वोच्च मंच है जहां देश की आत्मा बोलती है और जनता की अपेक्षाओं को स्वर मिलता है। ऐसे में लोकसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद के विरुद्ध अविश्वास की स्थिति बनना पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की सेहत पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। लोकसभा अध्यक्ष का दायित्व केवल सदन की कार्यवाही संचालित करना नहीं होता बल्कि वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं का संरक्षक और सत्ता व विपक्ष के बीच संतुलन का प्रतीक भी होता है। उनसे यह अपेक्षा रहती है कि वे निष्पक्षता के साथ सभी पक्षों को समान अवसर दें और सदन की गरिमा बनाए रखें। यदि विपक्ष का एक बड़ा वर्ग यह महसूस करता है कि उसकी आवाज को दबाया जा रहा है या उसे बोलने का समुचित अवसर नहीं मिल रहा तो यह स्थिति केवल राजनीतिक असंतोष नहीं बल्कि संस्थागत अविश्वास का संकेत बन जाती है।
पिछले कुछ वर्षों में संसद की कार्यवाही का बार बार बाधित होना हंगामा और टकराव का माहौल लोकतांत्रिक परंपराओं के क्षरण की ओर इशारा करता है। महत्वपूर्ण विधेयकों और राष्ट्रीय हित से जुड़े विषयों पर गंभीर चर्चा के स्थान पर गतिरोध हावी होना जनता के विश्वास को कमजोर करता है। इससे यह संदेश जाता है कि संसद अपने मूल उद्देश्य से भटक रही है और जनहित के मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति असहमति को सम्मान देना है। विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं बल्कि सरकार को जवाबदेह ठहराना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना भी है। इसके लिए सदन में बोलने का अवसर और प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता अनिवार्य है। यदि ये रास्ते संकुचित होते हैं तो असंतोष सड़कों और नारेबाजी के रूप में प्रकट होता है जिससे संसद की गरिमा को ही क्षति पहुंचती है। दूसरी ओर विपक्ष द्वारा बार बार कार्यवाही बाधित करना भी लोकतंत्र को कमजोर करता है क्योंकि इससे नीति निर्माण और विकास संबंधी निर्णय प्रभावित होते हैं।
यह समय टकराव नहीं बल्कि संवाद को प्राथमिकता देने का है। सत्तापक्ष को यह समझना होगा कि मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत है। विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि विरोध की भी एक मर्यादा और रचनात्मक दिशा होती है। लोकसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पदों से अपेक्षा है कि वे नियमों के साथ साथ व्यवहार में भी निष्पक्षता और संतुलन का परिचय दें।
अंततः यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति या दल का नहीं बल्कि लोकतंत्र की सेहत का है। संसद को फिर से संवाद का मंच बनाना होगा जहां असहमति भी मर्यादा के दायरे में व्यक्त हो और सत्ता व विपक्ष दोनों लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराएं। जनता ने सांसदों को नारे लगाने या सदन ठप करने के लिए नहीं बल्कि देश के भविष्य पर गंभीर विमर्श के लिए चुना है। यदि संसद इस अपेक्षा पर खरी नहीं उतरती तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है। इसलिए यह समय आत्ममंथन का है ताकि विश्वास संवाद और लोकतांत्रिक परिपक्वता के रास्ते को फिर से मजबूत किया जा सके।