सोना-चांदी की दौड़ ने तोड़ा बाजार का दम, व्यापारी भाव नहीं भगवान याद कर रहा हैं
सट्टेबाज़ी की चमक में फंसा व्यापार, पेमेंट चक्र ठप और मंदी की आहट तेज
जिस रफ्तार से सोना और चांदी भाग रहे हैं ऐसा लगता है मानो दोनों ने ओलंपिक की तैयारी शुरू कर दी हो। नतीजा यह है कि पूरे बाजार में हड़कंप मचा हुआ है। रोज़ सुबह दुकान खोलने से पहले व्यापारी भाव देखने से ज्यादा भगवान का नाम ले रहा है।
बड़ी-बड़ी पार्टियों के फेल होने की खबरें ऐसे आ रही हैं जैसे न्यूज़ चैनल पर “ब्रेकिंग न्यूज़” नहीं, बल्कि “ब्रेकिंग व्यापारी” चल रहा हो। हाल ही में इंदौर की एक पार्टी के लगभग 1800 करोड़ रुपये में दिवालिया होने की खबर ने पूरे व्यापार जगत को झकझोर कर रख दिया है। हालात ऐसे हैं कि लोगों ने मोबाइल से कैलकुलेटर ऐप तक डिलीट कर दिया—अब जोड़ने से डर लगने लगा है।
राजकोट, सूरत, अहमदाबाद, मुंबई, कोलकाता, जयपुर, दिल्ली और हैदराबाद जैसे बड़े व्यापारिक शहर अब “नुकसान टूर पैकेज” बनते जा रहे हैं। ऊपर से आगरा में एक एजेंट 200 किलो चांदी और सोना लेकर इस तरह गायब हुआ जैसे माल नहीं, कोई जादू की छड़ी हो। ज्वैलर्स की हालत यह है कि अब वे ग्राहक से पहले अपने ही स्टाफ को शक की नजर से देख रहे हैं।
भाव इतने ऊपर चले गए हैं कि आम आदमी ज्वैलरी खरीदने की सोच भी नहीं पा रहा। अब तो सोना देखने के लिए भी हिम्मत चाहिए। नतीजा यह है कि ज्वैलरी बाजार में ऐसा सन्नाटा पसरा है कि मच्छर भी उधार पर काटने आ रहा है।
मोटे अनुमान के मुताबिक भारत में सोना-चांदी की सट्टेबाज़ी में करीब 15 लाख करोड़ रुपये हवा हो चुके हैं। मजेदार बात यह है कि सिर्फ ज्वैलर्स ही नहीं, बल्कि कपड़ा, किराना, इलेक्ट्रॉनिक्स और रियल एस्टेट से जुड़े व्यापारी भी अपने-अपने कारोबार से पैसा निकालकर सोना-चांदी में झोंक चुके हैं। अब हालत यह है कि पैसा तिजोरी में बंद है और बाजार में पेमेंट का चक्का पंचर हो गया है।
इसका असर हर लाइन में दिख रहा है। कपड़ा बाजार में न पेमेंट आ रहा है, न व्यापारी माल लेने निकल रहा है। रिटेल की स्थिति ऐसी है कि दुकान खुली है, खर्चे दौड़ रहे हैं और ग्राहक सैर पर निकले हुए हैं।
रिटेलर्स पर किराया, स्टाफ की सैलरी, बैंक का ब्याज और पुराना स्टॉक ऐसा लटक रहा है जैसे सिर पर चार छाते खोल दिए हों—और बारिश फिर भी नहीं हो रही। शादी का सीजन होने के बावजूद ग्राहकी का न आना साफ संकेत दे रहा है कि आने वाला समय “सेल” का नहीं, बल्कि “सेल्फ कंट्रोल” का है।
जब तक पुराना पेमेंट नहीं आएगा, नया माल कैसे आएगा? और जो पेमेंट था, वह या तो सोना-चांदी में चला गया या प्रॉपर्टी में फंस गया। नतीजा यह है कि व्यापार हर लाइन में ठहरा हुआ है—ना चाल, ना चालाकी।
फाइनेंस मार्केट पहले ही लड़खड़ा चुका है। शेयर बाजार रोज़ ऐसे गिर रहा है जैसे उसे भी ईएमआई चुकानी हो। इसका सीधा असर बाजार की नब्ज पर पड़ रहा है।
अगर यही हाल रहा, तो हालात “खराब” से “खतरनाक” की ओर जाएंगे।