उत्तर प्रदेश की सामाजिक और राजनीतिक फिज़ा में इन दिनों एक नाम लगातार गूंज रहा है—सतुआ बाबा। पूर्वांचल से उभरे इस युवा संत की लोकप्रियता अब केवल धार्मिक दायरे तक सीमित नहीं रही, बल्कि सत्ता के शीर्ष तक पहुंचकर चर्चाओं का विषय बन चुकी है। प्रयागराज माघ मेला के शुभारंभ पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सतुआ बाबा के आश्रम पहुंचना इस चर्चा को निर्णायक मोड़ दे गया।
यह घटना सामान्य धार्मिक शिष्टाचार थी या फिर इसके पीछे कोई गहरा राजनीतिक-सामाजिक संदेश—इस प्रश्न ने प्रदेश के राजनीतिक विमर्श को झकझोर दिया है।
पूर्वांचल की जमीन से उभरा नया चेहरा
सतुआ बाबा की पहचान पूर्वांचल के ग्रामीण परिवेश से जुड़ी बताई जाती है। सीमित साधनों में पले-बढ़े बाबा ने आध्यात्म, सेवा और सनातन मूल्यों को अपना मार्ग बताया। समय के साथ उनका आश्रम श्रद्धालुओं का केंद्र बना और खासकर युवाओं में उनकी पकड़ मजबूत होती चली गई।
पूर्वांचल, जो लंबे समय से सामाजिक असमानताओं और राजनीतिक प्रयोगों की प्रयोगशाला रहा है, वहां से किसी संत का इस तरह उभरना अपने आप में अहम संकेत माना जा रहा है।
डिजिटल दौर का ‘युवा संत’
आज के समय में संतों की पहचान केवल प्रवचनों तक सीमित नहीं रहती। सोशल मीडिया सतुआ बाबा की लोकप्रियता का बड़ा मंच बनकर उभरा है। उनके वीडियो, संदेश और तस्वीरें लाखों लोगों तक पहुंच रही हैं। समर्थक उन्हें “जन-संत” की संज्ञा देते हैं, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु बनते दिखते हैं।
हालांकि, आलोचक इसे संगठित प्रचार और राजनीतिक संरक्षण का परिणाम भी मानते हैं। यही द्वंद्व सतुआ बाबा की छवि को और जटिल बनाता है।
मुख्यमंत्री का आश्रम दौरा: प्रतीक या संकेत?
माघ मेला जैसे राष्ट्रीय महत्व के आयोजन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सतुआ बाबा के आश्रम जाना साधारण घटना नहीं मानी जा सकती। योगी स्वयं एक सन्यासी मुख्यमंत्री हैं और संत समाज से उनका गहरा जुड़ाव रहा है। ऐसे में यह दौरा धार्मिक समरसता का प्रतीक भी हो सकता है, लेकिन राजनीति में प्रतीकों की अपनी भाषा होती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संदेश पूर्वांचल के सामाजिक समीकरणों और संत समाज के प्रभाव को स्वीकार करने जैसा भी हो सकता है।
उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य द्वारा सतुआ बाबा को लेकर की गई टिप्पणियों ने इस विषय को और सियासी बना दिया। इन बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया कि सतुआ बाबा अब केवल धार्मिक व्यक्तित्व नहीं रहे, बल्कि सत्ता विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं।
यह स्थिति बताती है कि संतों की भूमिका को लेकर सत्ता के भीतर भी एक स्पष्ट संवाद और संतुलन की जरूरत महसूस की जा रही है।
भारतीय राजनीति में संतों की भूमिका ऐतिहासिक रही है। लेकिन जब आस्था और सत्ता की सीमाएं धुंधली होती हैं, तब सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या संत समाज का बढ़ता राजनीतिक प्रभाव लोकतांत्रिक संतुलन को प्रभावित करता है?
क्या आध्यात्मिक नेतृत्व सामाजिक एकता का माध्यम बनेगा या राजनीतिक ध्रुवीकरण का?
सतुआ बाबा स्वयं सार्वजनिक रूप से राजनीतिक महत्वाकांक्षा से इनकार करते रहे हैं, लेकिन घटनाक्रम बता रहे हैं कि परिस्थितियां उन्हें एक बड़े विमर्श के केंद्र में ला चुकी हैं।
सतुआ बाबा का उभार उत्तर प्रदेश की बदलती सामाजिक और राजनीतिक संरचना का संकेत है, जहां आस्था, सोशल मीडिया और सत्ता एक-दूसरे के समानांतर नहीं, बल्कि एक-दूसरे में घुलती नजर आ रही हैं।
यह उभार अवसर भी है और चेतावनी भी—अवसर सामाजिक संवाद का, और चेतावनी सीमाओं के अतिक्रमण की।
आने वाले समय में यह तय होना बाकी है कि सतुआ बाबा की भूमिका समाज को जोड़ने वाली बनेगी या राजनीति की नई धुरी।
आकाश नवरत्न वरिष्ठ पत्रकार मथुरा।