पछेती गेहूं की बुआई के लिए अपनाएं ये उन्नत तकनीकें, बढ़ेगी पैदावार

कृषि विज्ञान केंद्र हाथरस के वैज्ञानिक डॉ. बलवीर सिंह के अनुसार, पछेती बुआई 25 दिसम्बर तक कर देनी चाहिए। पछेती बुआई की परिस्थितियों में अधिकांश किसान सामान्य प्रजातियों का चयन करते हैं, जिससे उत्पादकता में कमी आ जाती है। इस स्थिति में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए प्रमाणित और उन्नत प्रजातियों का ही चयन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। बुआई के लिए उन्नत और उपयुक्त प्रजातियां जैसे- के-9423, एच.डी.-3428, एच.डी.-3118, एच.आई.-1621 और एच.डी.-3271 विशेष रूप से लाभकारी साबित होती हैं। इन उन्नत प्रजातियों में प्रतिरोधक क्षमता और पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रति सहनशीलता भी अधिक होती है।

सिंचित क्षेत्रों में पछेती बुआई और लवणीय-क्षारीय मृदा में, और जहां धान के बाद गेहूं बोया जाता है और वहा ठंड के कारण पौधों में कल्ले कम निकलने की संभावना रहती है; अतः अच्छी उपज सुनिश्चित करने के लिए किसान भाई 125 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज का प्रयोग करें और कतारों की दूरी घटाकर 15-18 सें.मी. और बीज की गहराई 4-5 सेंटीमीटर होनी चाहिए। बीज को 2.5 ग्राम बाविस्टीन या 2 ग्राम कैप्टॉन से उपचारित करना चाहिए। बुआई सीडड्रिल से करनी चाहिए, क्योंकि छिटकवां विधि से बीज की अधिक मात्रा लगती है और जमाव कम होता है, जिससे उपज प्रभावित होती है।

*पछेती गेहूं में पोषक तत्व प्रबंधन*
मृदा स्वास्थ्य और नमी संरक्षण हेतु बुआई से पूर्व 5-10 टन गोबर की खाद खेत में मिलाएं। पछेती गेहूं में अच्छे दाने बनने के लिए एक हैक्टेयर मैं 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फॉस्फोरस और 50 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। डॉक्टर सिंह के अनुसार फास्फोरस की पूर्ति के लिए डीएपी की जगह एस०एस०पी (सिंगल सुपर फास्फेट) का उपयोग करें और सिंगल सुपर फास्फेट फास्फोरस के साथ-साथ सल्फर (गंधक) की भी पूर्ति करता है यदि मिट्टी में जिंक की कमी हो, तो बुआई के समय 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट डालें; खड़ी फसल में कमी दिखने पर 0.5% जिंक के घोल का छिड़काव करें। इसी प्रकार, भूमि में मैग्नीज की कमी होने पर पहली सिंचाई से 2-3 दिन पूर्व 1 कि.ग्रा. मैग्नीज सल्फेट को 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना फसल की बढ़वार के लिए अत्यंत लाभकारी है।”

जल प्रबंधन
गेहूं की फसल को 35-40 सेंटीमीटर पानी की आवश्यकता होती है और इसके लिए 4-6 सिंचाइयाँ आवश्यक हैं। अधिकतम उपज के लिए पहली सिंचाई ताज जड़ बनने (20-25 दिन) पर, दूसरी कल्ले फूटने (40-45 दिन) पर, तीसरी गांठ बनने (60-75 दिन) पर, और चौथी सिंचाई फूल आने (90-95 दिन) पर, पांचवी सिंचाइयाँ दाने में दूध पड़ने (110-115 दिन) और दाना कड़ा पड़ने (120-125 दिन) की अवस्था में करने से दानों का भराव और वजन सुनिश्चित होता है, जिससे पैदावार बढ़ती है।

*खरपतवार नियंत्रण*
गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले खरपतवारों में जैसे- गेहूं का मामा, कृष्णनील, मोथा, बथुआ, चटरी-मटरी, हिरनखुरी, सैंजी, अंकरी-अंकरा, जंगली जई, जंगली पालक, जंगली गाजर आदि प्रमुख हैं। यदि समय पर खरपतवारों का नियंत्रण नहीं किया गया तो फसल उत्पादन में 30 से 60 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। सामान्यत: ये खरपतवार मिट्टी से 47% नाइट्रोजन, 42% फॉस्फोरस, 50% पोटाश, 24% मैग्नीशियम और 39% कैल्शियम तक का उपयोग कर लेते हैं। खरपतवारों के नियंत्रण के लिए सल्फोसल्फ्यूरॉन 75 डब्ल्यू.पी. की 33 ग्राम या टाइसोप्रोट्यूरॉन+मैटसल्फ्यूरॉन मिथाइल 75 डब्ल्यू.पी.+20 डब्ल्यू.पी. की 1.0-1.3 किलो + 20 ग्राम की मिश्रण का छिड़काव किया जा सकता है। इसके अलावा, सल्फोसल्फ्यूरॉन 75% और मैटसल्फ्यूरॉन मिथाइल 5% की 40 ग्राम या क्लोडिनाफॉप 15% और मैटसल्फ्यूरॉन मिथाइल 1% वेस्टा 15 डब्ल्यू.पी. की 600-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर छिड़काव किया जाए। इससे खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है और गेहूं की फसल को पर्याप्त पोषण मिल सकेगा, जिससे उपज में वृद्धि संभव हो सकेगी।