हिंसा से जल रहा बांग्लादेश

बंग्लादेश आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ राजनीतिक अस्थिरता सामाजिक तानेबाने को जलाकर राख कर रही है। ढाका की सड़कों से उठती आग की लपटें केवल एक शहर या एक देश तक सीमित नहीं दिखतीं बल्कि उनका धुआँ पूरे दक्षिण एशिया की हवा को भारी कर रहा है। भारत में रह रहीं अवामी लीग की नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के कारण यह आशंका और गहरी हो जाती है कि बांग्लादेश के भीतर की हिंसा का असर सीमाओं के पार भी महसूस किया जा सकता है। मीडिया घरानों पर हमले हों या पूर्व राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान के आवास पर तोड़फोड़ हर घटना बताती है कि कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक मर्यादाएं लगातार कमजोर पड़ रही हैं।

ढाका में मीडिया संस्थानों पर आगजनी और तोड़फोड़ न केवल निंदनीय है बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। जब पत्रकारों की आवाज को गोलियों से दबाया जाए और दफ्तरों को आग के हवाले कर दिया जाए तो लोकतंत्र केवल कागजों में बचता है। एक पत्रकार की गोली मारकर हत्या की खबर ने यह साफ कर दिया है कि असहमति के लिए अब जगह नहीं छोड़ी जा रही। सत्ता और विरोध के बीच की लड़ाई में सच को कुचलने का यह तरीका किसी भी सभ्य समाज के लिए घातक है।

पूर्व राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान के आवास पर की गई तोड़फोड़ प्रतीकात्मक नहीं बल्कि ऐतिहासिक स्मृति पर हमला है। शेख मुजीबुर्रहमान केवल एक नेता नहीं बल्कि बांग्लादेश के राष्ट्रनिर्माण की आत्मा माने जाते हैं। उनके आवास को निशाना बनाना दरअसल उस विचार पर हमला है जिसने देश को पहचान दी। यही नहीं शेख हसीना के कार्यालय पर आगजनी और तोड़फोड़ यह दिखाती है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अब हिंसा में बदल चुकी है। लोकतंत्र में मतभेद का समाधान संवाद से होता है न कि आग और पत्थरों से। सबसे भयावह तस्वीर अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों से सामने आती है। एक हिंदू युवक को पेड़ से बांधकर जिंदा जलाने की घटना मानवता के लिए शर्मनाक है। धर्म के अपमान का आरोप लगाकर किसी व्यक्ति को भीड़ द्वारा पीटपीट कर मार डालना और फिर उसके शव को नग्न कर आग के हवाले कर देना यह बताता है कि उन्माद किस हद तक समाज को अमानवीय बना सकता है। पुलिस द्वारा शव की पहचान दीपू चंद बोस के रूप में किए जाने के बाद भी सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में नारेबाजी और जश्न का दृश्य यह सवाल उठाता है कि क्या भय और नफरत ने विवेक को पूरी तरह निगल लिया है।

यह कोई एक घटना नहीं बल्कि एक प्रवृत्ति का हिस्सा है। मॉब लिंचिंग और धार्मिक आधार पर हिंसा उस राज्य की विफलता का संकेत है जो अपने नागरिकों को सुरक्षा देने में असमर्थ हो जाता है। जब कानून का डर खत्म हो जाता है तो भीड़ ही न्यायाधीश बन बैठती है। ऐसी घटनाएं बांग्लादेश की बहुलतावादी पहचान को गहरी चोट पहुंचाती हैं और क्षेत्रीय शांति के लिए भी खतरा पैदा करती हैं। राजनीतिक हिंसा का एक और चेहरा उस्मान हादी की मौत के रूप में सामने आया। 2024 के छात्र आंदोलन में शेख हसीना के खिलाफ उभरे छात्र नेताओं में शामिल हादी को चुनाव प्रचार के दौरान सिर में गोली मारी गई। बेहतर इलाज के लिए उन्हें सिंगापुर ले जाया गया लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी। चुनाव आयोग द्वारा शोक व्यक्त करना औपचारिक प्रतिक्रिया हो सकती है लेकिन असली सवाल यह है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान हिंसा क्यों बढ़ रही है। लोकतंत्र में चुनाव उत्सव होते हैं शोक सभाएं नहीं।
बांग्लादेश में आज हर ओर अराजकता का माहौल है। सड़कों पर आग है संस्थानों पर हमले हैं और समाज के भीतर अविश्वास की खाई गहरी होती जा रही है। यह स्थिति किसी एक दल या सरकार की विफलता भर नहीं बल्कि एक व्यापक संकट का संकेत है जहाँ राजनीतिक स्वार्थी समूह अलगाववादी ताकतों को सहारा देकर माहौल को भड़का रहे हैं। सत्ता पाने की होड़ में देश को जलाने की यह राजनीति अंततः सभी को नुकसान पहुंचाती है।

यूनुस सरकार का यह कहना कि हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है और हिंदू युवक को जलाने की घटना की निंदा करना सही दिशा में कदम है। लेकिन केवल बयान काफी नहीं होते। जब जमीन पर हालात बदतर हों तो कड़े और निष्पक्ष कदमों की जरूरत होती है। दोषियों को सजा देना पीड़ितों को न्याय दिलाना और अल्पसंख्यकों में भरोसा बहाल करना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि यह भरोसा टूटता है तो देश के भीतर स्थायी शांति की कल्पना भी कठिन हो जाती है। भारत के लिए यह स्थिति विशेष चिंता का विषय है। बांग्लादेश के साथ भारत के ऐतिहासिक सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंध रहे हैं। सीमा पार होने वाली हर अस्थिरता का असर भारत पर भी पड़ता है चाहे वह शरणार्थियों का दबाव हो या कट्टरपंथी ताकतों का फैलाव। शेख हसीना का भारत में होना इस संवेदनशीलता को और बढ़ा देता है। ऐसे में भारत के विदेश मंत्रालय की भूमिका अहम हो जाती है। केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं बल्कि स्पष्ट और सशक्त निंदा की जरूरत है ताकि यह संदेश जाए कि मानवाधिकारों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर कोई समझौता स्वीकार्य नहीं है।