देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था संसद का उद्देश्य सरकार से जवाब मांगना कानून बनाना और जनता के मुद्दों पर गंभीर चर्चा करना है। वहीं लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और धरना प्रदर्शन प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन जब संसद का बहुमूल्य समय लगातार हंगामे की भेंट चढ़ने लगे और सड़क पर चल रहे आंदोलन समाधान की बजाय राजनीतिक टकराव का प्रतीक बन जाएं तब सबसे बड़ा नुकसान देश के छात्रों युवाओं और आम नागरिकों का होता है। नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक का मुद्दा अत्यंत गंभीर है। प्रतियोगी परीक्षाएं केवल चयन की प्रक्रिया नहीं बल्कि करोड़ों परिवारों की उम्मीदों का आधार होती हैं। यदि परीक्षा की गोपनीयता भंग होती है तो केवल प्रश्नपत्र नहीं बल्कि युवाओं का विश्वास भी टूटता है। इसलिए दोषियों के खिलाफ कठोर और समयबद्ध कार्रवाई आवश्यक है। सरकार ने जांच एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपी है कई गिरफ्तारियां हुई हैं और परीक्षा सुधारों का आश्वासन भी दिया गया है। साथ ही संसद में इस विषय पर चर्चा के लिए तैयार होने की बात भी कही गई है।
इसके बावजूद यदि संसद की कार्यवाही लगातार बाधित होती है तो सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि जवाबदेही तय कैसे होगी। विपक्ष का यह अधिकार है कि वह सरकार से कठिन प्रश्न पूछे और जिम्मेदारी तय करने की मांग करे। दूसरी ओर सरकार का दायित्व है कि वह तथ्यों के साथ जवाब दे और सुधार की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करे। लेकिन यदि चर्चा की जगह केवल गतिरोध और नारेबाजी रह जाए तो लोकतंत्र का सबसे प्रभावी मंच अपनी भूमिका नहीं निभा पाएगा।
संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं। शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतंत्र को मजबूत करते हैं लेकिन यदि किसी प्रदर्शन में हिंसा कानून व्यवस्था को चुनौती या सार्वजनिक जीवन में अनावश्यक बाधा उत्पन्न होती है तो आंदोलन की नैतिक शक्ति कमजोर पड़ जाती है। इसी प्रकार कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी भी है कि वे संयम और निष्पक्षता के साथ कार्य करें। लोकतंत्र में अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों साथ चलते हैं। यह भी सच है कि परीक्षा में अनियमितताओं का इतिहास किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहा है। समय समय पर विभिन्न राज्यों और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में पेपर लीक और धांधली के मामले सामने आते रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या केवल राजनीतिक नहीं बल्कि परीक्षा प्रणाली की संस्थागत कमजोरियों से जुड़ी हुई है। इसलिए इसका समाधान भी राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप से नहीं बल्कि व्यापक सुधारों से ही संभव है। संसद का प्रत्येक दिन जनता के धन से चलता है और वहां होने वाली बहसें देश की दिशा तय करती हैं। यदि महत्वपूर्ण विधेयक और जनहित के मुद्दे लगातार हंगामे के कारण पीछे छूटते हैं तो इसका नुकसान पूरे देश को उठाना पड़ता है। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष का दायित्व शासन चलाना है तो विपक्ष का दायित्व उसकी प्रभावी समीक्षा करना। दोनों की भूमिका टकराव नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन की है।
आज आवश्यकता छात्र हित को राजनीति से ऊपर रखने की है। सरकार को परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। वहीं विपक्ष को संसद के भीतर तथ्यों और तर्कों के आधार पर सरकार को घेरना चाहिए ताकि जनता के सामने पूरी सच्चाई आए और सुधार की दिशा तय हो।
देश के युवाओं को राजनीतिक नारों से अधिक निष्पक्ष परीक्षाओं की आवश्यकता है। उन्हें ऐसा तंत्र चाहिए जहां उनकी मेहनत का सम्मान हो और किसी पेपर लीक या भ्रष्ट व्यवस्था के कारण उनका भविष्य प्रभावित न हो। संसद यदि इस दिशा में सार्थक बहस और ठोस निर्णय का मंच बनती है तो वही लोकतंत्र की सबसे बड़ी सफलता होगी। भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संवाद सहमति और जवाबदेही में निहित है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि वे राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बहाल करें। संसद चले बहस हो दोषियों को दंड मिले और ऐसी व्यवस्था विकसित हो जिसमें हर प्रतिभाशाली छात्र को यह भरोसा हो कि उसकी सफलता केवल उसकी मेहनत से तय होगी। यही लोकतंत्र का उद्देश्य है और यही राष्ट्रहित की सबसे बड़ी कसौटी भी।