मुनाफे के खेल में दांव पर है जिंदगी

दवा केवल एक उत्पाद नहीं होती बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच खड़ी उम्मीद होती है। मरीज जब डॉक्टर की पर्ची लेकर मेडिकल स्टोर पहुंचता है तो उसके मन में यह अटूट विश्वास होता है कि जो दवा वह खरीद रहा है वह उसके रोग का उपचार करेगी। यदि वही दवा नकली हो या उसमें आवश्यक औषधीय तत्व ही न हों तो यह केवल उपभोक्ता के साथ धोखाधड़ी नहीं बल्कि उसके जीवन के अधिकार पर सीधा हमला है। भारत में नकली और अमानक दवाओं के बढ़ते मामले इसी गंभीर संकट की ओर संकेत कर रहे हैं।

भारत को विश्व की फार्मेसी कहा जाता है। दुनिया की बड़ी आबादी भारतीय दवा उद्योग पर भरोसा करती है। कोविड महामारी के दौरान भारत ने जिस तरह करोड़ों लोगों तक वैक्सीन पहुंचाई उससे देश की विश्वसनीयता और मजबूत हुई। लेकिन हाल के वर्षों में नकली और निम्न गुणवत्ता वाली दवाओं के लगातार सामने आते मामलों ने इस प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की गुणवत्ता जांच रिपोर्टें बताती हैं कि समय समय पर बड़ी संख्या में दवा नमूने निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। बिहार के समस्तीपुर में एंटीबायोटिक दवा के नमूने में सक्रिय औषधीय तत्वों का न होना और गया में नकली दवाओं के बड़े नेटवर्क का खुलासा यह साबित करता है कि यह समस्या अब छिटपुट नहीं रही। यदि मरीज को ऐसी दवा दी जाए जिसमें उपचार करने वाला तत्व ही न हो तो बीमारी बढ़ सकती है और कई मामलों में जान तक जा सकती है।

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि नकली दवाओं का कारोबार अब संगठित अपराध का रूप ले चुका है। नामी कंपनियों की पैकेजिंग और ब्रांड की हूबहू नकल कर बाजार में दवाएं उतारी जा रही हैं। कई बार दवा विक्रेता भी असली और नकली में अंतर नहीं कर पाते। जीवनरक्षक दवाओं की नकली खेपें तो सीधे मौत का कारण बन सकती हैं। यह केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि मानव जीवन के विरुद्ध अपराध है। इस समस्या का असर केवल मरीजों तक सीमित नहीं है। यदि भारतीय दवाओं की गुणवत्ता पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संदेह पैदा होता है तो इसका नुकसान पूरे दवा उद्योग और देश की अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ेगा। वर्षों की मेहनत से अर्जित भारत की वैश्विक साख कुछ आपराधिक गिरोहों की वजह से दांव पर नहीं लगाई जा सकती। समाधान केवल छापेमारी से नहीं निकलेगा। दवा निर्माण से लेकर अंतिम बिक्री तक प्रत्येक चरण की डिजिटल ट्रेसबिलिटी अनिवार्य करनी होगी। हर दवा पर क्यूआर कोड और ट्रैक एंड ट्रेस प्रणाली लागू हो ताकि उसकी पूरी यात्रा का रिकॉर्ड उपलब्ध रहे। औषधि नियंत्रण विभागों को पर्याप्त संसाधन और आधुनिक प्रयोगशालाएं उपलब्ध कराई जाएं। ड्रग इंस्पेक्टरों की रिक्तियां शीघ्र भरी जाएं और नियमित गुणवत्ता जांच को व्यापक बनाया जाए।

कानूनी व्यवस्था को भी अधिक कठोर बनाने की आवश्यकता है। यदि नकली दवा के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो इसे सामान्य आर्थिक अपराध नहीं माना जाना चाहिए। दोषियों के विरुद्ध गैर जमानती धाराओं में मुकदमा चलाकर त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जाए। दोषी कंपनियों और गिरोहों की संपत्ति जब्त करने तथा उन्हें स्थायी रूप से दवा निर्माण और वितरण से प्रतिबंधित करने जैसे प्रावधानों का प्रभावी उपयोग होना चाहिए। आम नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि दवाएं केवल अधिकृत मेडिकल स्टोर से खरीदें बिल अवश्य लें और पैकेट पर बैच नंबर निर्माण तिथि तथा एक्सपायरी की जांच करें। किसी भी संदिग्ध दवा की सूचना तुरंत संबंधित औषधि विभाग को दें। हालांकि अंतिम जिम्मेदारी सरकार और नियामक संस्थाओं की ही है क्योंकि दवा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है। दवा पर विश्वास ही स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी है। यदि अस्पताल डॉक्टर और दवा तीनों पर से भरोसा उठने लगे तो पूरी चिकित्सा व्यवस्था की नींव कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए नकली दवाओं के खिलाफ लड़ाई को केवल प्रशासनिक अभियान नहीं बल्कि राष्ट्रीय जनस्वास्थ्य मिशन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। क्योंकि जब दवा ही धोखा देने लगे तो हार केवल एक मरीज की नहीं होती बल्कि पूरे समाज की होती है।