आस्था के मेले या मौत के जाल

बिहार के नालंदा जिले में स्थित शीतला माता मंदिर में 31 मार्च 2026 को हुई भगदड़ ने एक बार फिर देश को झकझोर कर रख दिया। इस दर्दनाक हादसे में 8 श्रद्धालुओं की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए। मरने वालों में अधिकांश महिलाएं थीं। घटना के बाद मंदिर परिसर से लेकर अस्पताल तक अफरा-तफरी का माहौल रहा। प्रशासन ने तत्काल मंदिर और मेले को बंद कर दिया और स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिशें शुरू कीं। मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने गहरा दुख जताते हुए मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की और घायलों के बेहतर इलाज के निर्देश दिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर हादसे के बाद सिर्फ मुआवजा देना ही सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी रह गई है? क्या इंसानी जान की कीमत कुछ लाख रुपये में तय की जा सकती है? देश में भगदड़ की घटनाएं कोई नई नहीं हैं। हाल के वर्षों में कई बड़े हादसे हुए हैं जिन्होंने सैकड़ों परिवारों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया। हाथरस सत्संग भगदड़ 2024 में 121 लोगों की मौत हुई, हरिद्वार मनसा देवी मंदिर भगदड़ 2025 में अफवाह के कारण दर्जनों श्रद्धालुओं ने जान गंवाई, पुरी रथ यात्रा भगदड़ 2025 और तिरुपति मंदिर भगदड़ 2025 जैसे हादसे भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। इसके अलावा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ और प्रयागराज कुंभ में हुई दुर्घटनाएं भी यह बताने के लिए काफी हैं कि स्थिति कितनी गंभीर है।

इतिहास के पन्नों में झांकें तो तस्वीर और भी भयावह नजर आती है। 1954 का कुंभ मेला भगदड़ में लगभग 800 लोगों की जान गई थी। नैना देवी मंदिर भगदड़ 2008 और सबरीमाला भगदड़ 2011 जैसे हादसे भी प्रशासनिक लापरवाही के बड़े उदाहरण रहे हैं। हर बार हादसे के बाद एक जैसी तस्वीर सामने आती है—चारों तरफ बिखरी चप्पलें, रोते-बिलखते लोग, अपनों को ढूंढते परिजन और अस्पतालों में चीख-पुकार। यह दृश्य केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता की कहानी बयां करता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन घटनाओं के बावजूद कोई ठोस सुधार नहीं दिखता। प्रशासन को पहले से अंदाजा होता है कि लाखों की भीड़ जुटेगी, फिर भी पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था, निकासी मार्ग, भीड़ नियंत्रण और आपदा प्रबंधन की योजना क्यों नहीं बनाई जाती? क्या हर बार हादसे के बाद जांच बैठाना ही समाधान है? मुआवजा देना संवेदना का प्रतीक हो सकता है, लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है। जरूरत है कि सरकार और प्रशासन मिलकर एक सख्त और प्रभावी नीति बनाए। हर बड़े धार्मिक आयोजन के लिए अनिवार्य रूप से भीड़ प्रबंधन योजना, पर्याप्त पुलिस बल, सीसीटीवी निगरानी, चिकित्सा सुविधाएं और आपातकालीन निकासी मार्ग सुनिश्चित किए जाएं।

मंदिर समितियों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। जहां करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है, वहां श्रद्धालुओं की सुरक्षा को प्राथमिकता देना अनिवार्य होना चाहिए। केवल आस्था के नाम पर लोगों को जोखिम में डालना किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। आज जरूरत है कि इन हादसों को केवल दुर्घटना न मानकर गंभीर चेतावनी के रूप में लिया जाए। यदि अब भी सबक नहीं सीखा गया तो आस्था के ये केंद्र धीरे-धीरे मौत के जाल में बदलते रहेंगे। आस्था जीवन देती है, लेकिन अव्यवस्था उसे छीन लेती है। अब निर्णय सरकार और समाज दोनों को करना है कि वे आस्था को सुरक्षित बनाना चाहते हैं या उसे यूं ही हादसों के हवाले छोड़ देंगे।