समान नागरिक संहिता… वरदान या अभिशाप….?

-ओम प्रकाश मेहता-

करीब आठ महीने के अंतराल के बाद अब पुनः देश के राजनीतिक गलियारों में समान नागरिक संहिता कानून चर्चा में हैं, यद्यपि देश के विधि आयोग ने देश के नागरिकों से इस मसले पर सुझाव आमंत्रित किए हैं, किंतु इससे अधिक महत्वपूर्ण सत्ता व प्रति पक्षी दलों द्वारा अपने-अपने स्तर पर किया जा रहा चिंतन अधिक महत्वपूर्ण है, इस प्रस्तावित कानून को लेकर जहां आम नागरिक अपना हित खोज रहे हैं, वहीं राजनीतिक दल इस कानून को लेकर अपने भविष्य का आंकलन कर रहे हैं, राजनीतिक दलों की सोच का दायरा इस कानून के वरदान या अभिशाप बनने तक सीमित है, वहीं आम बुद्धिजीवी इस कानून में अपने साथ देश का भी भविष्य खोज रहे हैं। अभी तो यही खोज का विषय है कि 9 महीने बाद इस विचार ने पुनर्जन्म कैसे ले लिया और राजनीतिक स्तर पर इसके लागू करने पर लाभ हानि की खोज क्यों की जाने लगी?
अचानक इस कानून के सामने आने का कारण चुनाव की निकटता और देश के मतदाताओं को प्रभावित करने से जुड़ा बताया जा रहा है, क्योंकि गुजरात के विधानसभा चुनाव के समय प्रधानमंत्री जी ने इस कानून की गुहार लगाई थी और गुजरात ही नहीं अन्य राज्यों में भी इसका राजनीतिक लाभ मिला। शायद इसी से प्रेरित होकर चुनाव के कुछ ही महीनों पहले यह प्रस्तावित कानून याद किया गया। अब इस कानून के गुजरात में क्या हाल हैं, यह वरदानी सिद्ध हुआ या अभिशापित, यह तो कोई भी बताने को तैयार नहीं है, किंतु गुजरात में इस कानून की वरदानी पहल से ही प्रभावित होकर शायद प्रधानमंत्री जी को इस कानून की याद आई होगी और इसीलिए उन्होंने इसका जिक्र किया होगा?
अब केंद्रीय विधि आयोग के माध्यम से केंद्र सरकार ने 1 महीने में इस प्रस्तावित कानून पर सुझाव आमंत्रित किए हैं। सबसे अहम वैवाहिक रीति रिवाज है, जिस पर इस प्रस्तावित कानून के परिप्रेक्ष्य में सुझाव मांगे गए हैं, क्योंकि आज देश में हर जाति संप्रदाय के वैवाहिक रीति रिवाज अलग-अलग हैं, विधि आयोग ने भी इस प्रस्तावित कानून पर गंभीर चिंतन व सलाह मशवरा किया, इस संदर्भ में आयोग की दो दर्जन से भी अधिक बैठकें आयोजित की गई, इसके बाद आयोग ने इस कानून को देश के सामने रखकर उस पर सुझाव आमंत्रित किए हैं। विधि आयोग की इस पहल से लगता है कि मोदी सरकार चुनाव के पहले इस प्रस्तावित कानून का भविष्य तय कर उसके राजनीतिक लाभ हासिल करना चाहती है और इसका मसविदा तय कर संसद के अगले मानसून सत्र में इसे संसद के पटल पर रखना चाहती है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार सिर्फ समान नागरिक संहिता बिल ही नहीं बल्कि धर्मांतरण विरोधी कानून या जनसंख्या नियंत्रण कानून जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी गंभीर चिंतन कर रही है और मोदी जी की इसी सरकार के दौर में इनका भी भविष्य तय करना चाहती है। मौजूदा सरकार का यह भी आरोप है कि आजादी के बाद बनी नेहरू सरकार ने इस मसले पर भी विचार किया था, किंतु उन्होंने मुस्लिम कानूनों में कोई भी फेरबदल करने की हिम्मत नहीं जुटाई सिर्फ गैर मुस्लिम के कानूनों में ही फेरबदल करने की कोशिशें की गई। इस प्रकार यह विषय देश की राजनीति के लिए कोई नया नहीं है, सभी सरकारों ने इस पर चिंतन किया।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि दिल्ली हाईकोर्ट में इस मसले पर आधा दर्जन याचिकाएं लंबित है तथा कई राज्यों की सरकारों ने इस मामले पर विचार करने के लिए समितियां गठित कर रखी है। आज देश में गोवा ही अकेला राज्य है जहां यह कानूनी तौर पर लागू है। जहां तक केंद्र सरकार का सवाल है उसने दिल्ली हाई कोर्ट के नोटिस के जवाब में सिर्फ इतना ही कहा कि इस मसले पर गहन चिंतन व चर्चा की जरूरत है, इसके बाद ही इस के भविष्य पर फैसला लिया जा सकता है, अब पुनः विधि आयोग ने यह मसला देश के सामने रखकर सुझाव मांगे हैं, पता नहीं इस मसले का फैसला कब और कैसे होगा?