-डॉ. श्रीगोपाल नारसन-
मानहानि के केस में निचली अदालत से सजा होने को आधार बनाकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता अत्यधिक तत्परता दिखाते हुए रद्द कर दी गई है। लोकसभा सचिवालय की तरफ से इसका आदेश भी जारी कर दिया गया है। राहुल गांधी को सूरत की एक अदालत ने मानहानि के मुकदमे में दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनाई है। राहुल गांधी पर सन 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी शब्द पर विवादित टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया था। जिसे लेकर राहुल गांधी के विरुद्ध गुजरात के भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री पूर्णेश मोदी ने मानहानि का मुकदमा दायर किया था। जिसमे अदालत ने उन्हें दोषी करार देते हुए 2 साल की सजा सुनाई है। लोक प्रतिनिधित्व नियम के अनुसार, अगर किसी सांसद या विधायक को दो साल या इससे अधिक की सजा होती है तो उसकी सदस्यता चली जाती है यानि वह सदन में अयोग्य हो जाता है। राहुल गांधी के साथ भी ऐसा ही हुआ।
लोक-प्रतिनिधि अधिनियम 1951 की धारा 8(3) के तहत अगर किसी नेता को दो साल या इससे ज्यादा की सजा सुनाई जाती है तो उसे सजा होने के दिन से उसकी अवधि पूरी होने के बाद आगे छह वर्षों तक चुनाव लड़ने पर रोक का प्रावधान है। अगर कोई विधायक या सांसद है तो सजा होने पर वह अयोग्य ठहरा दिया जाता है। उसे अपनी विधायकी या सांसदी छोड़नी पड़ती है। इसी नियम के तहत राहुल की सदस्यता चली गई। सूरत की जिस अदालत ने राहुल को सजा सुनाई है, उस अदालत ने राहुल गांधी को फैसले के खिलाफ सेशंस कोर्ट में याचिका दायर करने के लिए एक महीने का समय दिया है। तब तक राहुल गांधी की सजा पर रोक है, मतलब वह इस दौरान जेल जाने से बचे रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के अनुसार, ऐसे मामलों में सजा निलंबित होने का मतलब दोषी को केवल जेल जाने से राहत मिलती है लेकिन सजा के अन्य असर प्रभावी रहेंगे। जैसे कि अगर कोई संसद या विधानसभा का सदस्य है तो उसकी सदस्यता चली जाएगी, वोट देने का अधिकार भी खत्म हो जाएगा। चूंकि कोर्ट ने राहुल को दोषी करार कर दिया है। इसलिए नियम के अनुसार राहुल की सदस्यता चली गई है। हालांकि जिस न्यायालय ने सजा सुनाई है,जब उसी ने सजा को अपील समय तक यानि एक माह तक के लिए सजा को निलंबित किया है तो संसद सदस्यता समाप्त करने के लिए भी एक माह का इंतजार किया जा सकता था,जो संसद ने नही किया और उनकी सदस्यता समाप्त कर दी।
अब राहुल गांधी के पास केवल दो विकल्प है। चूंकि राहुल गांधी को सजा सुनाने वाली सूरत की अदालत ने उन्हें एक महीने का समय अपील के लिए दिया है। इस एक महीने के अंदर राहुल गांधी को उक्त कोर्ट के फैसले के खिलाफ सेशंस कोर्ट में अपील दायर करनी होगी,इसके बाद सेशंस कोर्ट के फैसले पर राहुल गांधी का भविष्य निर्भर होगा। चूंकि राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता खत्म कर दी गई है। ऐसे में अगर वह अपनी सदस्यता वापस हासिल करना चाहते हैं तो उन्हें हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का रूख भी करना पड़ेगा। अगर राहुल गांधी सेशंस कोर्ट जाते हैं और वहां से उन्हें राहत मिलती है तो वह जेल जाने से बच सकते हैं। इसके अलावा उनपर चुनाव न लड़ पाने का छह साल का प्रतिबंध भी लग जाएगा। आमतौर पर अदालतें जब किसी व्यक्ति को सजा सुनाती हैं और अगर सजा मामूली है और संज्ञेय अपराध नहीं है तो उसको अगली शीर्ष अदालत में अपील के लिए जो समय दे दिया जाता हैं, उस अवधि के लिए उसके द्वारा तय जमानत राशि देने पर जमानत दे दी जाती हैं।
जब अदालत को जमानत राशि तय करनी होती है तो वह कई बातों पर विचार करती है। जैसे अपराध या सजा की स्थिति की कितनी गंभीर है। वही जिसे जमानत दी जा रही है, उसकी स्थिति क्या है. उसके लिए कितनी जमानत की राशि उपयुक्त रहेगी। कई बार ये जमानत राशि व्यक्ति की हैसियत देखकर भी तय होती है। जमानत की ऊपर की स्थितियों में बताई गई जमानत की राशि अदालत या जज के विवेक पर तय होता है। अदालत यह फैसला करती है कि जिस व्यक्ति को जमानत दी जा रही है, उसे कितनी जमानत की राशि देनी चाहिए, ये व्यक्ति की हैसियत के साथ उसके अपराध और सजा की प्रवृत्ति पर भी निर्भर करता है। राहुल गांधी को संसद से अयोग्य करार दिया जाना कांग्रेस पार्टी के के लिए बड़ा झटका है। क्योंकि इसके बाद वे रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट 1951 के तहत 8 साल तक वे चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। राहुल गांधी के खिलाफ बाकी केस भी अभी लंबित है, जिनमें सबसे अहम है मोदी सरकार के दौरान नेशनल हेराल्ड केस में केन्द्रीय जांच एजेंसी ईडी की तरफ से हो रही जांच। उक्त कोर्ट का फैसला ऐसे समय आया है जब पार्टी के कई बड़े नेता पार्टी छोड़कर जा चुके हैं। कांग्रेस पार्टी आज जिस तरह विपरीत परिस्थितियों का सामना कर रही है और राहुल गांधी को संसद से अयोग्य करार दिया गया, ऐसे में सन 1977 जैसी ही स्थिति फिर से पैदा हो गई है। आपातकाल के समय इंदिरा गांधी और कांग्रेस पार्टी को भारी हार का सामना करना पड़ा था। सीबीआई ने उन्हें अपनी कस्टडी में लिया था। पूर्व प्रधानमंत्री को उस समय इन्क्वायरी कमीशन के सामने पेश होना पड़ा था और उनसे कई कड़े सवाल पूछे गए थे। बाद में उन्होंने खुद को पीड़ित बताया था और जनता की सहानुभूति बटौरी थी। उसके बाद वे योद्धा बनकर उभरी थी और सन 1980 में शानदार सत्ता में वापसी की थी। अब ऐसा हो सकता है कि इस सजा और लंबित मामलों के चलते राहुल गांधी मोदी सरकार पर कम हमलावर हों। इसके साथ ही, उनके लिए यह एक अवसर होगा अपना विकल्प खोजने का, जो कांग्रेस व देश के लिए आगे लाया जाए,इनमें प्रियंका गांधी भी बेहतर विकल्प बन सकती है।
बीजेपी लगातार ये कहती रही है कि उसके चुनाव जीतने में राहुल गांधी बड़ा फैक्टर हैं। हालांकि, ये पूरी तरह से सच नहीं है, बीजेपी को जीत इसलिए मिलती रही क्योंकि विपक्ष में बड़ा बिखराव है। इसी कारण मोदी वर्सेज राहुल करने से 2024 के चुनाव के लिए बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने में कांग्रेस को सफलता नहीं मिल पा रही है। वही ममता बनर्जी ने तो यहां तक कह दिया कि पीएम मोदी के लिए राहुल सबसे बड़े टीआरपी हैं। ऐसे में अगर राहुल आक्रामक रुख नहीं अपनाते है और कांग्रेस बड़े भाई के अपने बर्ताव वाले रूख को छोड़ती है तो विपक्षी पार्टियां उनके साथ आ सकती है और तीसरे मोर्चे की जरूरत नहीं होगी। ममता बनर्जी ने हमेशा बातचीत के लिए राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी को ही तरजीह दी है। बिहार के सीएम नीतीश कुमार, जो पीएम पद के लिए हाल के समय तक बड़े दावेदार माने जाते रहे, उनकी भी सोनिया गांधी से अच्छी बनती है। दिल्ली के सीएम केजरीवाल भी कई मौको पर राहुल पर तंज कसते रहे हैं। हालांकि, राहुल गांधी को सजा सुनाए जाने के बाद केजरीवाल ने ट्वीट करते हुए कहा था कि कांग्रेस के साथ हमारे मतभेद है, लेकिन मानहानि केस में राहुल गांधी को इस तरह से फंसाना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि गैर बीजेपी नेताओं और पार्टियो को हटाने के लिए साजिश रची जा रही है। ऐसे में कोर्ट के इस फैसले के बाद जहां एक तरफ राहुल गांधी का हस्तक्षेप पार्टी के लिए,लिए जाने वाले फैसलों में जहां कम हो सकता है वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के अब कांग्रेस के साथ आने की संभावना है। इसके अलावा, राहुल गांधी की संसद सदस्यता जाने के बाद कर्नाटक, केरल में विधानसभा का चुनाव होगा, यह भी हो सकता है कि इस सहानुभूति का कर्नाटक में कांग्रेस को फायदा मिले। केन्द्रीय जांच एजेंसियों के खिलाफ कांग्रेस समेत 14 पार्टियो का एक साथ सुप्रीम कोर्ट का रुख करना यह बताता है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस दूसरे विपक्षी दलों को अपने साथ लेकर आगे बढ़ सकती है। ऐसे में गैर बीजेपी पार्टियो का गठबंधन आने वाले समय में और प्रभावी हो सकता है। इस हालात में कांग्रेस को इस सजा से भी संजीवनी मिल सकती है।