लोकतंत्र में कानून का शासन सर्वोपरि है। किसी व्यक्ति का राजनीतिक कद कितना भी बड़ा क्यों न हो वह कानून से ऊपर नहीं हो सकता। यदि किसी नेता पर भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए। लेकिन कानून के शासन का अर्थ केवल कार्रवाई करना नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि कार्रवाई संविधान और न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप हो। जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद आजम खान को गाजियाबाद की विशेष पीएमएलए अदालत द्वारा 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद एक बार फिर यही सवाल चर्चा के केंद्र में है कि जांच एजेंसियों की कार्रवाई कितनी निष्पक्ष और पारदर्शी है। आजम खान उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक प्रभावशाली चेहरा रहे हैं। रामपुर से लेकर प्रदेश की राजनीति तक उनका लंबा राजनीतिक सफर रहा है। मंत्री और सांसद के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न मुकदमों और कानूनी कार्रवाइयों ने उनके राजनीतिक जीवन को लगातार प्रभावित किया है। लगभग 11 महीने जेल में रहने के बाद रामपुर जेल से रिहाई के तुरंत बाद एक अन्य मामले में ईडी की कार्रवाई और फिर न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की घटना ने इस प्रकरण को और चर्चा में ला दिया है।
प्रवर्तन निदेशालय का आरोप है कि जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण और वित्तीय प्रबंधन में सरकारी धन के कथित दुरुपयोग तथा वित्तीय अनियमितताओं की आशंका है। जांच एजेंसी विश्वविद्यालय की स्थापना में इस्तेमाल धन उसके स्रोत और कथित मनी ट्रेल की पड़ताल करना चाहती है। निश्चित रूप से किसी भी शैक्षणिक संस्थान के वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता होनी चाहिए। सरकारी सहायता हो या निजी चंदा हर राशि का हिसाब-किताब नियमानुसार होना चाहिए। यदि जांच में सरकारी धन के दुरुपयोग या अवैध लेन-देन के ठोस प्रमाण सामने आते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यहां यह समझना भी जरूरी है कि आरोप और अपराध सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति को केवल जांच एजेंसी के आरोपों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आजम खान को न्यायिक हिरासत में भेजे जाने का अर्थ यह नहीं है कि उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं। उन्हें भी संविधान के तहत निष्पक्ष सुनवाई और अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है। न्याय की यही बुनियादी शर्त है कि फैसला राजनीतिक पहचान या जनभावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि साक्ष्यों के आधार पर हो। इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू केंद्रीय जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता से जुड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी और अन्य केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाइयों को लेकर लगातार राजनीतिक विवाद सामने आते रहे हैं। विपक्ष इन कार्रवाइयों को राजनीतिक प्रतिशोध बताता है जबकि सरकार का पक्ष रहता है कि जांच एजेंसियां कानून के अनुसार अपना काम कर रही हैं। ऐसे में जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उन्हें अपने हर कदम को ठोस साक्ष्यों और पारदर्शी प्रक्रिया के जरिए सही साबित करना होगा। किसी भी कार्रवाई पर राजनीतिक पक्षपात की छाया पड़ना लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर करता है। यह भी उतना ही सच है कि राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप लगाकर हर जांच को खारिज नहीं किया जा सकता। यदि किसी नेता के विरुद्ध वित्तीय अनियमितताओं के प्रमाण हैं तो केवल उसका राजनीतिक प्रभाव उसे जांच से बचाने का आधार नहीं बन सकता। कानून का समान रूप से लागू होना ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को इस मामले में संयम बरतना चाहिए। सत्ता पक्ष को जांच को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश करने से बचना चाहिए और विपक्ष को भी न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले इसे साजिश करार देने से परहेज करना चाहिए।
इस पूरे प्रकरण में जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े विद्यार्थियों और कर्मचारियों के हितों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। विश्वविद्यालय किसी एक राजनीतिक व्यक्ति की पहचान तक सीमित नहीं होता। उससे हजारों विद्यार्थियों का भविष्य और अनेक परिवारों की आजीविका जुड़ी होती है। यदि वित्तीय अनियमितताओं की जांच हो रही है तो उसका असर शिक्षा व्यवस्था पर नहीं पड़ना चाहिए। दोषियों की जवाबदेही तय हो लेकिन विद्यार्थियों की पढ़ाई और संस्थान की शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित न हों।