दिल्ली के रामलीला मैदान में भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता की हुंकार भले ही बुलंद हुई हो, लेकिन उसकी असली परीक्षा उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव में होगी। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा की विदाई का दावा कर चुनावी माहौल गर्मा दिया है, मगर सवाल यह है कि क्या विपक्षी दल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर एकजुट रह पाएंगे? क्योंकि भाजपा को चुनौती देने से पहले विपक्ष को अपने भीतर की खींचतान से पार पाना होगा। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के प्रदर्शन ने विपक्ष को नई उम्मीद दी है। सपा ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश में भाजपा को बड़ा झटका दिया था। लेकिन लोकसभा की सफलता को विधानसभा चुनाव की जीत की गारंटी मानना राजनीतिक भूल होगी। प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में बहुमत के लिए 202 सीटें चाहिए। इसके लिए केवल नारों और सभाओं से नहीं, बल्कि मजबूत संगठन, प्रभावी उम्मीदवारों और बूथ स्तर तक तालमेल से जनता का विश्वास जीतना होगा।
गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती सीटों का बंटवारा है। सपा प्रदेश में अपनी प्रमुख विपक्षी ताकत की हैसियत बनाए रखना चाहती है, जबकि कांग्रेस अपने राजनीतिक विस्तार के लिए अधिक सीटों की अपेक्षा करेगी। दोनों दलों के बीच खींचतान बढ़ी तो भाजपा विरोधी एकजुटता कमजोर पड़ सकती है। वर्ष 2017 का सपा-कांग्रेस गठबंधन इसका उदाहरण है, जब साथ चुनाव लड़ने के बावजूद दोनों दल अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सके। स्पष्ट है कि गठबंधन की मजबूती मंच साझा करने से नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और जमीनी समन्वय से तय होती है।
अखिलेश यादव का पीडीए समीकरण उनकी राजनीति का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को साथ बनाए रखने के लिए ठोस राजनीतिक भागीदारी और भरोसेमंद नेतृत्व जरूरी होगा। दूसरी ओर भाजपा के पास प्रदेशव्यापी संगठन, बूथ स्तर का नेटवर्क और सत्ता का अनुभव है। ऐसे में विपक्ष को महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने के साथ अपना वैकल्पिक कार्यक्रम भी जनता के सामने रखना होगा। लोकतंत्र में चुनावी व्यवस्था और मतदाता सूची से जुड़े सवालों की निष्पक्ष जांच जरूरी है, लेकिन आरोपों को प्रमाणों के साथ प्रस्तुत करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जनता केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा करती है। रामलीला मैदान में अखिलेश यादव ने भाजपा को चुनौती दे दी है, लेकिन उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता नारों से नहीं, जनता के विश्वास और बूथ स्तर की मेहनत से निकलेगा। यदि सपा, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सीटों की खींचतान तथा नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाए, तो उनकी एकजुटता चुनाव से पहले ही कमजोर पड़ सकती है। वर्ष 2027 में भाजपा की विदाई का दावा कितना प्रभावी होगा, यह इस बात से तय होगा कि विपक्ष अपनी एकता को चुनावी रणनीति और जनसमर्थन में कितना बदल पाता है।