कांग्रेस की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसे चुनाव हारने से ज्यादा परेशानी हार की जिम्मेदारी स्वीकार करने में होती है। कभी ईवीएम पर सवाल, कभी चुनाव आयोग पर आरोप और कभी मतदाता सूची को कठघरे में खड़ा करना—लेकिन जब बैलेट पेपर से हुए चुनावों में भी अपेक्षित सफलता नहीं मिलती, तो पार्टी को अपनी राजनीतिक जमीन का आकलन करना चाहिए। कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस के बावजूद विधान परिषद की चारों सीटों पर भाजपा-जद(एस) गठबंधन की जीत उसके लिए गंभीर चेतावनी है। सत्ता में रहकर भी यदि शिक्षक और स्नातक मतदाताओं का भरोसा नहीं जीता जा सका, तो इसकी वजह विरोधियों में तलाशने के बजाय संगठन और सरकार के कामकाज में खोजनी होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैलेट पेपर से हुए चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन पर सवाल उठाया, तो कांग्रेस नेताओं ने वाराणसी में भाजपा की हार और नागपुर में कांग्रेस की जीत का हवाला दिया। निश्चित रूप से भाजपा को भी अपनी हार से सबक लेना चाहिए, लेकिन दूसरे की पराजय अपनी विफलता का जवाब नहीं हो सकती। नागपुर में कांग्रेस की जीत उसके लिए उत्साहजनक है, मगर एक सीट की सफलता को देशव्यापी राजनीतिक वापसी का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। इसी तरह बिहार में निराशाजनक प्रदर्शन भी पार्टी के संगठनात्मक संकट की ओर संकेत करता है।
कांग्रेस को समझना होगा कि चुनाव केवल आरोपों, नारों और विरोध की राजनीति से नहीं जीते जाते। इसके लिए मजबूत संगठन, प्रभावी नेतृत्व, सही उम्मीदवार और जनता के बीच निरंतर संवाद जरूरी है। शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच कमजोर पड़ता समर्थन पार्टी के लिए विशेष चिंता का विषय होना चाहिए। बेरोजगारी, महंगाई और शिक्षा जैसे मुद्दे उठाना पर्याप्त नहीं है; जनता को इन समस्याओं के समाधान की ठोस नीति और भरोसेमंद नेतृत्व भी चाहिए। चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन हर हार के बाद व्यवस्था को दोष देना राजनीतिक जवाबदेही से बचने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। ईवीएम पर सवालों का निर्णय प्रमाणों और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। साथ ही, बैलेट पेपर से हुए चुनावों में खराब प्रदर्शन को ईवीएम से जुड़ी हर आशंका का स्वतः खंडन मानना भी उचित नहीं होगा। असल सवाल यह है कि मतदान का तरीका चाहे जो हो, मतदाता का विश्वास कौन जीत रहा है।
भाजपा को भी इन परिणामों से अजेय होने का भ्रम नहीं पालना चाहिए। राजनीतिक गढ़ों में हार और जीत यह बताती है कि जनता का रुख बदल सकता है। लेकिन कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि भाजपा की कमजोरी अपने आप उसकी ताकत नहीं बन सकती। विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए सरकार की आलोचना के साथ बेहतर विकल्प प्रस्तुत करना भी जरूरी है। कांग्रेस के सामने अब स्पष्ट विकल्प है—या तो वह हर हार के बाद नए आरोपों की ढाल तलाशती रहे, या संगठन, नेतृत्व और नीतियों की कमजोरियों को स्वीकार कर सुधार की दिशा में आगे बढ़े। पहला रास्ता आसान जरूर है, लेकिन वापसी का रास्ता नहीं। जनता को बहाने नहीं, भरोसेमंद विकल्प चाहिए। बैलेट पेपर हो या ईवीएम, अंततः चुनाव मतदाता का विश्वास जीतकर ही जीता जाता है।