मुंबई में लौटता खौफ, सुरक्षा पर सवाल

मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी ही नहीं, बल्कि सपनों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। मायानगरी की चमक-दमक, फिल्मी सितारों की लोकप्रियता, उद्योग-व्यापार की रफ्तार और चौबीसों घंटे सक्रिय रहने वाली जिंदगी इसकी पहचान है। देश के कोने-कोने से लाखों लोग बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर यहां पहुंचते हैं। लेकिन जब इसी महानगर में सरेआम गोलीबारी की घटनाएं सामने आती हैं, तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मुंबई में खौफ फिर लौट रहा है? क्या कभी अंडरवर्ल्ड और संगठित अपराध की दहशत से जूझ चुका यह शहर दोबारा असुरक्षा के साये में जाने लगा है? अभिनेता टाइगर श्रॉफ की गाड़ी पर कथित गोलीबारी की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा की हैं। इस घटना में अभिनेता के सुरक्षित होने, जबकि उनके ड्राइवर और एक ऑटो-रिक्शा चालक के घायल होने की सूचना सामने आई है। यदि जांच में इन तथ्यों की पुष्टि होती है, तो यह मामला केवल किसी फिल्मी सितारे की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महानगर में आम नागरिकों की हिफाजत से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न बन जाएगा।

मुंबई ने एक दौर में अंडरवर्ल्ड, जबरन वसूली और संगठित अपराध की चुनौतियों का सामना किया है। उस समय अपराधियों की धमकियों और हिंसक वारदातों ने फिल्म उद्योग, कारोबारी जगत और आम जनता के बीच भय का माहौल पैदा किया था। पुलिस की कार्रवाई और खुफिया तंत्र की सक्रियता से शहर ने इन चुनौतियों पर काफी हद तक काबू पाया। ऐसे में गोलीबारी की कोई घटना लोगों को उस पुराने दौर की याद दिलाए, तो इसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। हालांकि, एक घटना के आधार पर अंडरवर्ल्ड की वापसी का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसके पीछे व्यक्तिगत रंजिश, धमकी, वसूली या किसी आपराधिक गिरोह की भूमिका है या नहीं, इसका फैसला जांच के बाद ही होना चाहिए।
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू आम नागरिकों की सुरक्षा है। किसी चर्चित अभिनेता की गाड़ी पर गोलीबारी होने से मामला सुर्खियों में आना स्वाभाविक है, लेकिन गोली किसी पहचान या हैसियत को देखकर नहीं चलती। सड़क पर काम करने वाला ड्राइवर, ऑटो चलाकर परिवार पालने वाला व्यक्ति, बाजार में खरीदारी करने निकला परिवार या देर रात काम से घर लौटने वाला कर्मचारी भी ऐसी वारदात का शिकार हो सकता है। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था का आकलन केवल विशिष्ट व्यक्तियों को उपलब्ध कराई गई सुरक्षा के आधार पर नहीं होना चाहिए। असली कसौटी यह है कि आम आदमी अपने दैनिक जीवन में कितना सुरक्षित महसूस करता है।

मुंबई पुलिस देश के अनुभवी पुलिस बलों में गिनी जाती है। महानगर की विशाल आबादी, आर्थिक गतिविधियों और संवेदनशील प्रतिष्ठानों को देखते हुए यहां कानून-व्यवस्था बनाए रखना बड़ी जिम्मेदारी है। पुलिस के सामने चुनौती केवल वारदात के बाद आरोपियों को गिरफ्तार करने की नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की भी है। घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, हमलावरों के आने-जाने के रास्तों और इस्तेमाल किए गए हथियारों की जांच से सच्चाई सामने लाने का प्रयास होना चाहिए। यदि अवैध हथियारों या संगठित अपराध के नेटवर्क की भूमिका सामने आती है, तो उसके पूरे तंत्र पर प्रभावी कार्रवाई आवश्यक होगी। यह भी समझना होगा कि अपराध पर नियंत्रण केवल पुलिस गश्त बढ़ाने से संभव नहीं है। इसके लिए मजबूत खुफिया तंत्र, संदिग्ध गतिविधियों पर निगरानी, हथियारों की अवैध आपूर्ति पर रोक और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। अपराधियों को यह संदेश मिलना चाहिए कि कानून से बच निकलना आसान नहीं है। त्वरित और निष्पक्ष जांच, प्रभावी अभियोजन तथा दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार सजा ही व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास मजबूत कर सकती है।

ऐसी घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर तरह-तरह के दावे और अटकलें भी फैलने लगती हैं। किसी गिरोह का नाम उछाला जाता है, तो कभी बिना प्रमाण किसी बड़ी साजिश की चर्चा शुरू हो जाती है। इससे जनता में अनावश्यक भय फैलने के साथ जांच भी प्रभावित हो सकती है। मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाए, प्रशासन की जवाबदेही तय करे और जनता तक सही जानकारी पहुंचाए। मुंबई की पहचान उसकी जीवंतता, मेहनतकश लोगों और कठिन परिस्थितियों से उबरने की क्षमता से बनी है। किसी एक घटना के आधार पर पूरे शहर को असुरक्षित घोषित करना उचित नहीं, लेकिन गोलीबारी जैसी वारदातों को सामान्य मान लेना भी खतरनाक है। महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस को यह सुनिश्चित करना होगा कि फिल्मी सितारों और महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा के साथ आम नागरिकों की हिफाजत भी सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहे। सुरक्षा का भरोसा किसी वर्ग विशेष तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि सड़क पर काम करने वाले हर व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।