भारतीय राजनीति में रिश्तों के प्रतीकों के जरिए राजनीतिक संदेश देने की परंपरा पुरानी है। कभी नेता स्वयं को जनता का सेवक बताते हैं तो कभी परिवार के सदस्य की तरह जनता के सुख-दुःख में साथ होने का दावा करते हैं। इसी राजनीतिक शैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष के लिए ‘नाराज फूफा’ शब्द का प्रयोग किया। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी इसी तंज को आगे बढ़ाते हुए विपक्ष पर विकास कार्यों में हर समय आपत्ति तलाशने का आरोप लगाया। दरअसल ‘नाराज फूफा’ जैसे राजनीतिक व्यंग्य के पीछे विपक्ष की भूमिका को लेकर बड़ा सवाल छिपा है। लोकतंत्र में सरकार के फैसलों पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन सवाल तथ्यों के आधार पर हों और उनके साथ वैकल्पिक नीति भी सामने रखी जाए तो लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होती है। इसके विपरीत अधूरी जानकारी और राजनीतिक आरोपों के आधार पर लगातार विरोध लोकतांत्रिक बहस को कमजोर कर सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। ऑपरेशन सिंदूर जैसे सैन्य अभियानों को लेकर सरकार से जवाबदेही मांगना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन सैन्य तैनाती और रणनीतिक कार्रवाई से जुड़ी संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक करना सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में पारदर्शिता और गोपनीयता के बीच संतुलन जरूरी है। वहीं सत्ता पक्ष के लिए भी लोकप्रिय घोषणाओं और जनकल्याणकारी योजनाओं के साथ आर्थिक अनुशासन का सवाल महत्वपूर्ण है। मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना योजना के लिए 2026-27 में 23 हजार 883 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है और करीब 1.25 करोड़ महिलाएं इससे जुड़ी हैं। महिलाओं और गरीब वर्ग को आर्थिक सहायता देना सामाजिक सुरक्षा का माध्यम हो सकता है लेकिन ऐसी योजनाओं की दीर्घकालीन वित्तीय स्थिरता पर भी विचार होना चाहिए।
उत्तर प्रदेश का 2026-27 बजट भी करीब 8.51 लाख करोड़ रुपये के व्यय और 1.18 लाख करोड़ रुपये के राजकोषीय घाटे का अनुमान रखता है। ऐसे में सरकारों के सामने चुनौती केवल तत्काल राहत देने की नहीं बल्कि शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार और उत्पादक निवेश के लिए पर्याप्त संसाधन बचाए रखने की भी है। राजनीति में न तो हर सवाल को विरोध मानना उचित है और न हर लोकलुभावन घोषणा को जनकल्याण का अंतिम प्रमाण। विपक्ष का दायित्व है कि वह सरकार से कठोर सवाल पूछे लेकिन प्रमाण और वैकल्पिक समाधान के साथ। सरकार का दायित्व है कि वह जनकल्याणकारी योजनाएं चलाए लेकिन उनके वित्तीय भार और परिणामों का भी हिसाब जनता के सामने रखे।
लोकतंत्र को न ‘नाराज फूफा’ वाली राजनीति की जरूरत है और न ऐसी ‘बेफिक्र मामा’ वाली राजनीति की जिसमें आज की लोकप्रियता के सामने भविष्य की आर्थिक जिम्मेदारियां पीछे छूट जाएं। विरोध भी जरूरी है और जनकल्याण भी। मगर दोनों के साथ विवेक और जिम्मेदारी उससे भी ज्यादा जरूरी है। आम जनता को भी राजनीतिक व्यंग्य और लोकलुभावन घोषणाओं से आगे बढ़कर नीतियों के वास्तविक प्रभाव को समझना होगा। आखिर लोकतंत्र में सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कौन किससे नाराज है बल्कि यह भी होना चाहिए कि देश और जनता के हित में कौन सा रास्ता अधिक जवाबदेह और टिकाऊ है। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।