सत्य निकेतन हादसा: संवेदनहीनता और जिम्मेदारी का सवाल

देश की राजधानी दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पांच मंजिला इमारत का अचानक ढह जाना केवल एक दर्दनाक हादसा नहीं है बल्कि यह राजधानी में छात्रों और किरायेदारों की सुरक्षा को लेकर सरकारी व्यवस्था की गंभीर खामियों को भी उजागर करता है। रविवार दोपहर हुए इस हादसे में सात लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने की सूचना है। जिस इमारत में हादसा हुआ वह निजी पीजी के रूप में इस्तेमाल हो रही थी और दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के नजदीक होने के कारण यहां बड़ी संख्या में छात्र रहते हैं। हादसे के बाद बचाव कार्य में स्थानीय लोगों और छात्र संगठनों की भूमिका ने जहां मानवीय संवेदना का परिचय दिया वहीं प्रशासनिक तैयारियों और आपदा प्रबंधन की गति पर भी सवाल खड़े किए।
किसी भी इमारत के निर्माण और उसमें लोगों के रहने की अनुमति से पहले सुरक्षा मानकों की जांच करना स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि किसी भवन में नियमों की अनदेखी हुई थी तो सवाल केवल उसके मालिक की लापरवाही तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि संबंधित विभागों ने समय रहते ऐसी इमारतों की पहचान और जांच क्यों नहीं की। हादसा होने के बाद कार्रवाई करना जरूरी है लेकिन उससे अधिक जरूरी यह सुनिश्चित करना है कि अगला हादसा होने ही न पाए।

सत्य निकेतन और दिल्ली के अन्य छात्र बहुल इलाकों में बड़ी संख्या में विद्यार्थी महंगे किराये और सीमित आवासीय सुविधाओं के बीच रहने को मजबूर हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के विशाल छात्र समुदाय की तुलना में छात्रावासों की उपलब्धता बेहद सीमित है। ऐसे में निजी पीजी और किराये के कमरों पर निर्भरता बढ़ती है। इन भवनों में कई बार कम जगह में अधिक लोगों को रखा जाता है और सुरक्षा मानकों की अनदेखी की जाती है। छात्रों से मनमाना किराया वसूला जाता है लेकिन उनके जीवन की सुरक्षा के लिए जरूरी इंतजामों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। यह स्थिति केवल दिल्ली की नहीं बल्कि देश के अनेक बड़े शहरों की समस्या है। शिक्षा के लिए घर से दूर आने वाले विद्यार्थी आवास की समस्या से जूझते हैं। उन्हें सुरक्षित और सस्ता आवास उपलब्ध कराना शिक्षा व्यवस्था का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। यदि विश्वविद्यालयों के पास पर्याप्त छात्रावास नहीं होंगे और निजी आवासों की नियमित निगरानी नहीं होगी तो ऐसे हादसों का खतरा बना रहेगा।

इस हादसे के बाद राजनीतिक दलों की सक्रियता और सोशल मीडिया पर दिखाई गई संवेदनशीलता को लेकर भी सवाल उठे हैं। आपदा और दुर्घटना के समय नेताओं की पहली प्राथमिकता पीड़ितों की मदद और राहत कार्य होना चाहिए। सोशल मीडिया पर संवेदना व्यक्त करना अपनी जगह जरूरी है लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जिम्मेदार लोग घटनास्थल पर राहत व्यवस्था की निगरानी करें और पीड़ित परिवारों की सहायता सुनिश्चित करें। किसी त्रासदी के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और एक-दूसरे पर तंज कसना लोकतांत्रिक राजनीति की गरिमा के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। इसी तरह किसी भी संगठन या राजनीतिक दल के लिए यह दावा करना आसान है कि वह संकट की घड़ी में सबसे पहले जनता के बीच पहुंचता है। असली परीक्षा तब होती है जब वास्तव में कोई आपदा सामने आती है। सत्य निकेतन हादसे ने यह सवाल खड़ा किया है कि राजनीतिक और सामाजिक संगठन राहत कार्यों में कितनी तत्परता से भाग लेते हैं और उनकी प्राथमिकता वास्तव में पीड़ितों की मदद है या केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराना।

हादसे के बाद भवन मालिक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होना जरूरी है और यदि जांच में लापरवाही साबित होती है तो दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए। लेकिन केवल गिरफ्तारी को कार्रवाई का अंत मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। दिल्ली सरकार और नगर निकायों को छात्र बहुल क्षेत्रों में बने सभी पीजी और किराये की इमारतों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराना चाहिए। जर्जर भवनों की पहचान होनी चाहिए। अवैध निर्माण पर कार्रवाई होनी चाहिए और जिन अधिकारियों की मिलीभगत या लापरवाही सामने आए उनके खिलाफ भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।