नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने एक बार फिर मानव सभ्यता के सामने प्रकृति की ताकत का आईना रख दिया है। देखते ही देखते शांत बहने वाली नदियां विनाश की धारा बन गईं। घर उजड़ गए। सड़कें और पुल बह गए। वाहन सैलाब में समा गए और अनेक परिवार अपनों की तलाश में दर-दर भटकने को मजबूर हो गए। सैकड़ों लोगों की मौत और बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की खबरें इस त्रासदी की भयावहता को बताने के लिए पर्याप्त हैं। नेपाल-तिब्बत सीमा के निकट झील फटने की घटना ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। नदियों का जलस्तर बढ़ने के साथ ही कई इलाकों को खाली कराया जा रहा है। बचाव अभियान तक रोकना पड़ा है। यह स्थिति बताती है कि खतरा अभी समाप्त नहीं हुआ है। पहाड़ों में होने वाली ऐसी घटनाओं का असर केवल उस स्थान तक सीमित नहीं रहता। पानी और मलबे की धार नीचे बसे गांवों और शहरों तक तबाही लेकर पहुंचती है।
सबसे दर्दनाक पक्ष जनहानि और लापता लोगों की बढ़ती संख्या है। हर लापता व्यक्ति के पीछे एक परिवार है। किसी परिवार के पास अपने प्रियजन की तस्वीर है तो किसी के पास केवल इंतजार। आपदा के आंकड़े सरकारी रिपोर्टों में भले ही संख्या दिखाई देते हों लेकिन जमीन पर हर संख्या एक टूटे परिवार की कहानी है। यही वजह है कि इस समय सबसे बड़ी प्राथमिकता राहत और बचाव अभियान को अधिकतम गति देना होनी चाहिए। भारत के लिए नेपाल की यह त्रासदी सामान्य पड़ोसी देश की आपदा नहीं है। दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सामाजिक और पारिवारिक संबंध हैं। बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक नेपाल में रहते और काम करते हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में लोगों का आवागमन लगातार बना रहता है। इसलिए नेपाल में आई आपदा की चिंता भारत के परिवारों तक भी पहुंचना स्वाभाविक है। लापता भारतीय नागरिकों की तलाश और प्रभावित लोगों तक सहायता पहुंचाने के प्रयासों को और तेज करने की आवश्यकता है। लेकिन इस त्रासदी ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है। क्या इतनी बड़ी आपदा से पहले प्रभावी चेतावनी संभव थी? यदि पहाड़ी क्षेत्रों में बनने वाली झीलों और ग्लेशियरों की लगातार निगरानी की जाती है तो संभावित खतरे का आकलन पहले क्यों नहीं हो पाया? नेपाल और चीन के बीच मौसम और आपदा संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था होने के बावजूद चेतावनी को लेकर सवाल उठना गंभीर विषय है। हालांकि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वैज्ञानिक और प्रशासनिक स्तर पर पूरी जांच आवश्यक है। हिमालय आज केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं रह गया है। वह जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप के बढ़ते दबाव का संवेदनशील क्षेत्र बन चुका है। तापमान में बदलाव से ग्लेशियरों और बर्फ की संरचना प्रभावित हो रही है। पहाड़ी ढलानों पर अस्थिरता बढ़ रही है। कई स्थानों पर सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्यों ने प्राकृतिक संतुलन को चुनौती दी है। जब ग्लेशियर से बर्फ और मलबा नीचे आता है तो नदी का प्रवाह अचानक बदल सकता है। प्राकृतिक बांध बन सकता है और उसके टूटने पर पानी की विकराल धारा पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले सकती है।
इसलिए हिमालय को केवल विकास की प्रयोगशाला मानना खतरनाक होगा। पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाना और नदियों के किनारे बस्तियां बसाना विकास की जरूरत हो सकती है लेकिन इस विकास की कीमत मानव जीवन नहीं होनी चाहिए। हर परियोजना में पर्यावरणीय जोखिम का वास्तविक आकलन जरूरी है। पहाड़ों की क्षमता और उनकी प्राकृतिक संरचना को समझे बिना किया गया निर्माण आने वाले समय में बड़ी आपदाओं को जन्म दे सकता है। इस घटना से भारत नेपाल और चीन के बीच आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की जरूरत भी स्पष्ट होती है। नदियां किसी सीमा को नहीं मानतीं। हिमालय किसी एक देश की संपत्ति नहीं है। पहाड़ों से निकलने वाली नदियां सीमाओं को पार करते हुए करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं। इसलिए मौसम संबंधी जानकारी जलस्तर की सूचना ग्लेशियरों की निगरानी और संभावित खतरे की चेतावनी को साझा करने की मजबूत व्यवस्था होनी चाहिए।
ग्लेशियर टूटने और भूकंप के क्रम को लेकर अलग-अलग दावे भी सामने आए हैं। ऐसे मामलों में राजनीतिक या कूटनीतिक बयानबाजी के बजाय वैज्ञानिक तथ्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। आपदा के कारणों की सही पहचान तभी संभव है जब विशेषज्ञ निष्पक्ष जांच करें। भविष्य की रणनीति भी उसी वैज्ञानिक निष्कर्ष पर आधारित होनी चाहिए। नेपाल की त्रासदी हमें यह भी याद दिलाती है कि आपदा को पूरी तरह रोक पाना शायद हमेशा संभव नहीं है लेकिन उससे होने वाली जनहानि को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए आधुनिक निगरानी प्रणाली चाहिए। समय पर चेतावनी देने की व्यवस्था चाहिए। संवेदनशील इलाकों में रहने वाले लोगों की पहचान और सुरक्षित स्थानों की पहले से तैयारी जरूरी है। राहत और बचाव के लिए प्रशिक्षित दल और पर्याप्त संसाधन हर समय तैयार रहने चाहिए। प्रकृति किसी देश की सीमा नहीं देखती। वह जाति भाषा और राष्ट्रीयता के आधार पर भेदभाव नहीं करती। इसलिए आपदा प्रबंधन भी सीमाओं के भीतर सीमित नहीं रह सकता। हिमालयी क्षेत्र के देशों को साझा खतरे के सामने साझा जिम्मेदारी निभानी होगी। नेपाल की यह त्रासदी केवल आज की राहत का सवाल नहीं है। यह आने वाले कल की तैयारी का सवाल है। यदि इस आपदा से भी हमने सबक नहीं लिया तो अगली त्रासदी के समय हमारे पास केवल अफसोस बच सकता है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता है।