स्वतंत्रता दिवस देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक आदर्शों को याद करने का अवसर होता है। ऐसे अवसर पर प्रधानमंत्री के भाषण से देश को एकजुट करने और लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत करने का संदेश अपेक्षित रहता है। लेकिन 15 अगस्त को लालकिले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक विमर्श के स्तर को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि हथियार उठाने वाले नक्सलियों से निपटा जा चुका है लेकिन अब देश को ‘दिमागी नक्सलियों’ से सतर्क रहने और उन्हें अलग-थलग करने की जरूरत है। समस्या यह है कि ‘दिमागी नक्सल’ कोई कानूनी या संवैधानिक श्रेणी नहीं है। सरकार ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि इस शब्द के दायरे में कौन लोग आते हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार से असहमति रखने वाले नागरिकों को इस तरह के राजनीतिक विशेषणों से चिन्हित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित है?
लोकतंत्र की खूबसूरती ही असहमति में है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है और जनता को अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन करने का भी संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। युवाओं की नाराजगी हो या किसानों का आंदोलन या किसी नीति के खिलाफ नागरिकों का विरोध लोकतंत्र में उसका जवाब संवाद और तर्क से दिया जाना चाहिए। असहमति को देशविरोध या किसी खतरनाक विचारधारा से जोड़ देना समस्या का समाधान नहीं हो सकता। ‘अर्बन नक्सल’ शब्द को लेकर भी पिछले वर्षों में इसी तरह की बहस होती रही है। सरकार की ओर से संसद में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि ‘शहरी नक्सल’ कोई आधिकारिक कानूनी श्रेणी नहीं है। इसके बावजूद राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श में इस शब्द का इस्तेमाल विरोधियों को निशाना बनाने के लिए होता रहा है। अब ‘दिमागी नक्सल’ जैसा नया शब्द सामने आना इस आशंका को और मजबूत करता है कि राजनीतिक विरोध को एक खतरनाक पहचान देने की कोशिश की जा रही है।
स्वतंत्रता दिवस पर सरकार की आधिकारिक थीम ‘युवा शक्ति फॉर विकसित भारत-2047’ रखी गई थी। ऐसे समय में जब देश की बड़ी युवा आबादी रोजगार शिक्षा प्रतियोगी परीक्षाओं और भविष्य को लेकर सवाल उठा रही है तब सरकार से उम्मीद थी कि वह युवाओं के साथ संवाद बढ़ाएगी। युवाओं की आवाज को सुनने और उनकी चिंताओं का समाधान करने के बजाय उन्हें किसी राजनीतिक विशेषण से संबोधित करना दूरी बढ़ाने वाला कदम साबित हो सकता है। प्रधानमंत्री ने सिविल डिफेंस में स्वयंसेवी बल की जरूरत पर भी जोर दिया। स्वयंसेवा और नागरिक भागीदारी निश्चित रूप से लोकतंत्र को मजबूत कर सकती है लेकिन यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि ऐसे किसी भी तंत्र का इस्तेमाल राजनीतिक विरोध को दबाने या समाज में विभाजन पैदा करने के लिए न हो। लोकतांत्रिक देश में नागरिक स्वयंसेवा का उद्देश्य समाज की सुरक्षा और सेवा होना चाहिए न कि विचारों के आधार पर लोगों को अलग-अलग खेमों में बांटना। यह भी याद रखना होगा कि भारत की लोकतांत्रिक ताकत सरकार की शक्ति में नहीं बल्कि असहमति को स्वीकार करने की क्षमता में है। सत्ता में बैठा व्यक्ति जितना शक्तिशाली होता है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह होता है कि वह अपने आलोचकों की आवाज कितनी सहजता से सुनता है। संसद से सड़क तक विरोध की आवाज को दबाने के बजाय उसके साथ संवाद लोकतंत्र की वास्तविक पहचान है।
किसी भी सरकार से असहमति रखने वाले व्यक्ति को नक्सल या किसी अन्य खतरनाक श्रेणी में डाल देना आसान हो सकता है लेकिन इससे लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होता है। विचार का जवाब विचार से और आरोप का जवाब तथ्य से दिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में किसी नागरिक को केवल इसलिए संदिग्ध नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वह सरकार की नीतियों से सहमत नहीं है। भारत ने आजादी के 80 वर्ष पूरे किए हैं। यह अवसर हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति का नाम नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असहमति का अधिकार और लोकतांत्रिक संवाद भी उसी स्वतंत्रता के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इसलिए सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी को भाषा और आचरण की ऐसी मर्यादा बनाए रखनी चाहिए जिससे लोकतंत्र मजबूत हो। ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्द राजनीतिक बहस को और तीखा करने के बजाय उसे संकीर्ण बनाते हैं। देश को जोड़ने वाली भाषा आज की सबसे बड़ी जरूरत है। असहमति को दुश्मनी समझने के बजाय लोकतंत्र की ताकत माना जाए यही विकसित भारत की वास्तविक पहचान हो सकती है।