करंट कर्मचारियों को, झटका जनता को!

लोकतंत्र में सरकार का पहला दायित्व जनता को बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराना है। इन सेवाओं की गुणवत्ता ही प्रशासन की कार्यक्षमता और जवाबदेही का पैमाना होती है। जब सरकारी व्यवस्था जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती, तो सुधार की माँग उठना स्वाभाविक है। लेकिन विडंबना यह है कि व्यवस्था में सुधार की चर्चा होते ही बहस जनता को बेहतर सुविधा देने के बजाय निजीकरण के विरोध और समर्थन के बीच उलझ जाती है। बिजली आज विलासिता नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। बच्चों की पढ़ाई, किसानों की सिंचाई, छोटे दुकानदारों का कारोबार, उद्योगों का उत्पादन और अस्पतालों में मरीजों की देखभाल तक बिजली पर निर्भर है। बिजली गुल होने का अर्थ केवल घर में अंधेरा होना नहीं, बल्कि जनजीवन प्रभावित होना और आर्थिक नुकसान उठाना भी है। उपभोक्ता हर महीने बिल चुकाता है और बदले में निर्बाध तथा भरोसेमंद आपूर्ति की अपेक्षा करता है। ऐसे में बिजली व्यवस्था से जुड़े किसी भी विवाद का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़े, यह उचित नहीं है।

हरियाणा सहित देश के कई हिस्सों में बिजली क्षेत्र के निजीकरण और कर्मचारी संगठनों की माँगों को लेकर बहस होती रही है। बिजली क्षेत्र में निजीकरण को लेकर कर्मचारियों की आशंकाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रोजगार की सुरक्षा, सेवा शर्तें और भविष्य की अनिश्चितता कर्मचारियों के वास्तविक सरोकार हो सकते हैं। सरकार का दायित्व है कि वह इन सवालों पर पारदर्शिता बरते और संवाद के माध्यम से समाधान निकाले। निजीकरण को न तो हर समस्या का रामबाण माना जा सकता है और न ही हर परिस्थिति में उसका विरोध उचित है। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि व्यवस्था में बदलाव से उपभोक्ताओं को कितनी बेहतर सेवा मिलती है, बिजली की दरें कितनी किफायती रहती हैं और ग्रामीण तथा कमजोर वर्गों के हित कितने सुरक्षित रहते हैं। कर्मचारियों को अपनी माँगों के लिए धरना-प्रदर्शन करने और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने का पूरा अधिकार है। लेकिन अधिकारों के साथ जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं। अपनी माँगें मनवाने के लिए बिजली आपूर्ति बाधित करना या आम नागरिकों को परेशानी में डालना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। सरकार पर दबाव बनाने के दूसरे प्रभावी रास्ते भी हो सकते हैं। आखिर एक छोटे दुकानदार, किसान, विद्यार्थी या मरीज का कर्मचारियों और सरकार के बीच चल रहे विवाद से क्या लेना-देना है?

दूसरी ओर, सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। यदि कर्मचारियों की समस्याएँ लंबे समय तक अनसुनी रहती हैं, नीतिगत फैसलों में पारदर्शिता नहीं होती और संवाद के रास्ते बंद हो जाते हैं, तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। केवल हड़ताल समाप्त करा देना स्थायी समाधान नहीं है। सरकार को विवाद की जड़ तक पहुँचकर कर्मचारियों की जायज माँगों पर निर्णय लेना चाहिए तथा निजीकरण की योजना से जुड़े सभी पहलुओं को सार्वजनिक करना चाहिए। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें कर्मचारियों के अधिकार सुरक्षित रहें, उपभोक्ताओं को उचित दरों पर नियमित बिजली मिले और सरकारी अथवा निजी संचालक की जवाबदेही सुनिश्चित हो। आवश्यक सेवाओं की न्यूनतम आपूर्ति बनाए रखने, शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण करने और बिजली कटौती की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था तैयार रखने पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। सरकार और कर्मचारियों को समझना होगा कि जनता किसी की राजनीतिक या कर्मचारीगत लड़ाई का मोहरा नहीं है। जिस उपभोक्ता के पैसे से व्यवस्था चलती है, उसे ही बिजली के लिए परेशान होना पड़े, तो यह व्यवस्था की विफलता है। सुधार का उद्देश्य केवल स्वामित्व बदलना नहीं, बल्कि सेवा की गुणवत्ता बढ़ाना होना चाहिए। आखिर बिजली जनता की जरूरत है, किसी के दबाव की ढाल नहीं। कर्मचारियों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना चाहिए, सरकार को उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए, लेकिन जनता की बुनियादी सुविधा से समझौता नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी व्यवस्था की सफलता का वास्तविक प्रमाण जनता का संतोष है। इसलिए बिजली के सवाल पर टकराव नहीं, संवाद और जवाबदेही का रास्ता अपनाया जाना चाहिए।