अर्थव्यवस्था: यह 2013 का भारत नहीं, तीसरे मुकाम तक पहुंचने के लिए करने होंगे ठोस काम

-अजय बग्गा-

वर्ष 2014 में भारत को दुनिया की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर गिना जाता था। लेकिन 2022 में भारत ने छलांग लगाते हुए दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल कर लिया। फिलहाल भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (मौजूदा अमेरिकी डॉलर की कीमतों पर नॉमिनल जीडीपी के मामले में) बना हुआ है। इस वक्त भारत सिर्फ अमेरिका (255 खरब अमेरिकी डॉलर), चीन (181 खरब अमेरिकी डॉलर), जापान (42 खरब अमेरिकी डॉलर) और जर्मनी (41 खरब अमेरिकी डॉलर) से पीछे है।

अनुमान लगाए जा रहे हैं कि 2027 से 2030 के बीच भारत पचास खरब डॉलर से ज्यादा के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के साथ, जापान को पछाड़ते हुए दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में इसके बारे में बात की। नई दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा, ‘हमारे ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए कहा जा सकता है कि हमारी सरकार के तीसरे कार्यकाल में भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। यह मोदी की गारंटी है।’

भारतीय स्टेट बैंक द्वारा जारी अनुमानों के अनुसार भी वर्ष 2027 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के जुलाई, 2023 के वैश्विक आर्थिक पूर्वानुमान के अनुसार, वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर 2022 के 3.5 फीसदी से घटकर 2023 और 2024 दोनों में तीन फीसदी रहने का अनुमान है। भारत में वृद्धि दर 2023 में 6.1 फीसदी (5.9 फीसदी पूर्व अनुमान), जबकि 2024 में 6.3 फीसदी रहने की उम्मीद है।

यह स्थिति दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था में किए गए महत्वपूर्ण सुधारों की देन है। इनमें वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), दिवाला और दिवालियापन संहिता, कॉरपोरेट करों की दर में उल्लेखनीय कमी, मेक इन इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया जैसी रणनीतियां और उत्पादन को प्रोत्साहन देने वाली कई योजनाएं शामिल हैं। इन सबकी बदौलत, भारत दुनिया की सबसे तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था बना हुआ है। वित्त वर्ष 2024 के केंद्रीय बजट में अर्थव्यवस्था की ऊंची वृद्धि को बरकरार रखने के लिए कुछ और कदम भी उठाए गए हैं। पूंजी निवेश परिव्यय में लगातार तीसरे वर्ष उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, जो रिकॉर्ड 10 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। यह सकल घरेलू उत्पाद का 3.3 फीसदी है।

सतत सुधार, व्यापक स्थिरता, स्वस्थ वित्तीय क्षेत्र, कॉरपोरेट क्षेत्र के ऋणों को कम करने के प्रयास और पूंजीगत व्यय भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के प्रमुख चालक रहे हैं। विभिन्न क्षेत्रों के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (पीएलआई) से लगभग 37.5 अरब अमेरिकी डॉलर का पूंजीगत व्यय आकर्षित होने, 60 लाख रोजगार पैदा होने और वित्त वर्ष 2023-27 के दौरान जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी वर्तमान 17 से बढ़कर 20 फीसदी से ज्यादा होने की उम्मीद है। वहीं, कुल आयात में 40 फीसदी हिस्सा रखने वाले क्षेत्रों के लिए घोषित पीएलआई योजनाओं का लक्ष्य आयात को सीमित करना, निर्यात को बढ़ावा देना और भारत के जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ाना है।

स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर अपनी एक हालिया रिपोर्ट में कहा है कि इस दशक के अंत से पहले भारत की जीडीपी दोगुनी होकर साठ खरब अमेरिकी डॉलर होने की पूरी उम्मीद है। इससे यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। लेकिन इससे ज्यादा रोमांचक कहानी एक निम्न मध्यम-आय वाली अर्थव्यवस्था से एक उच्च मध्यम-आय वाली अर्थव्यवस्था के तौर पर भारत का उभरना है।

वर्ष 2030 में भारत की जीडीपी के 35 खरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर पचास खरब अमेरिकी डॉलर होते ही, भारतीयों की प्रति व्यक्ति आय 2,500 अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष से बढ़कर 4,000 अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष हो जाएगी। इसके साथ ही, घरेलू उपभोग व्यय 21 खरब अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष से बढ़कर 34 खरब अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष हो जाएगा। कुल मिलाकर, 2030 तक भारतीय घरेलू उपभोग व्यय का आकार 30 से 34 खरब अमेरिकी डॉलर के बीच होगा, जो आज भारत की कुल जीडीपी के लगभग बराबर है।

प्रतिष्ठित निवेश बैंकिंग कंपनी मॉर्गन स्टेनले का भारत की स्थिति में हो रहे इस बदलाव पर कहना है, ‘अब यह 2013 वाला भारत नहीं रह गया है। सिर्फ दस साल के भीतर भारत ने वैश्विक व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान पा लिया है।’ मॉर्गन स्टेनले ने उन दस वजहों को गिनाया है, जिनकी बदौलत यह बदलाव आया है। इनमें शामिल हैं- आपूर्ति में सुधार, अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाना, रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, सामाजिक हस्तांतरणों को डिजिटल बनाने पर जोर, दिवाला और दिवालियापन संहिता, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण, एफडीआई पर ध्यान, भारत के खुदरा म्यूचुअल फंड और पेंशन फंड प्रवाह, सरकारी सहायता और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारत के प्रति झुकाव। इन कोशिशों के निहितार्थ समझने की जरूरत है।

जीडीपी में हिस्सेदारी के मुताबिक विनिर्माण क्षेत्र और पूंजीगत खर्च में बढ़ोतरी होगी। वस्तुओं व सेवाओं के निर्यात में व्यापक फायदों के साथ निर्यात बाजार में भारत की हिस्सेदारी 2031 तक 4.5 फीसदी तक बढ़ जाएगी, जो कि 2021 के स्तर के दोगुने से ज्यादा है। चालू खाते का घाटा कम होगा, बचत व निवेश बढ़ेगा और बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर देने की वजह से स्थायी आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। भारत के इस अमृत काल और स्वर्ण महोत्सव के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियां वैश्विक मंदी के अलावा आपूर्ति संबंधी बाधाओं व कुशल श्रमिकों की कमी की वजह से कमोडिटी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हो सकती हैं। स्टैंडर्ड चार्टर्ड के मुताबिक, रोजगार सृजन, बुनियादी ढांचे के विकास, आय की असमानता और पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए होने वाले प्रयास भारत के विकास की संभावनाओं को मजबूत बनाएंगे।

दरअसल अगले सात साल में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए उच्च स्तरीय नौकरियां पैदा करना और युवाओं में इन्हें संभालने के लिए जरूरी कौशल का विकास करना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी। निकट भविष्य में वैश्विक विकास में भारत की भूमिका का महत्वपूर्ण बने रहना तय है। लेकिन इसके लिए वादों को पूरा करना और निर्धारित विजन का बेहतरीन क्रियान्वयन सुनिश्चित करना जरूरी होगा।