गुजरात की रिफाइनरी पर यूरोपीय संघ ने लगाया बैन, भारत ने दी प्रतिक्रिया
नई दिल्ली । गुजरात के वाडिनार में नायरा एनर्जी की रिफाइनरी पर लगाए यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों पर भारत ने साफ कहा है कि वह किसी एकतरफा प्रतिबंध को नहीं मानेगा। जो संयुक्त राष्ट्र के दायरे से बाहर हों। विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि ऊर्जा क्षेत्र में दोहरे मापदंड नहीं होने चाहिए। बता दें कि गुजरात की यह रिफाइनरी यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के दायरे में आ गई है क्योंकि ईयू ने रूसी तेल निर्यात पर नई पाबंदियां लगा दी हैं। यूरोपीय संघ द्वारा इन पाबंदियों का मकसद रूस का युद्ध के लिए फंडिंग रोकना है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यूरोपीय संघ के विदेश नीति प्रमुख ने कहा कि पहली बार, हम भारत में रोसनेफ्ट की सबसे बड़ी रिफाइनरी को बैन कर रहे हैं। भारत ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह किसी भी एकतरफा प्रतिबंध को नहीं मानता। भारत एक जिम्मेदार देश है और अपनी कानूनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। भारत सरकार ऊर्जा सुरक्षा को अपने नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए सबसे अहम मानती है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि ऊर्जा व्यापार के मामले में दोहरे मापदंड नहीं होने चाहिए। वहीं यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों से गुजरात की रिफाइनरी पर असर पड़ सकता है। इससे निर्यात में कमी आ सकती है। नए नियमों में रूसी तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल तय की गई है। इससे बाहर के देश पश्चिमी जहाजों और बीमा सेवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके अलावा 105 और जहाजों पर प्रतिबंध लगाया गया है। अब तक कुल 223 जहाज बैन हो चुके हैं। इससे रूस की तेल की कीमत से बेचने की क्षमता कम हो जाएगी।
रोसनेफ्ट ने 2017 में कमोडिटीज ट्रेडर और रूसी निवेश फर्म के साथ मिलकर एस्सार ऑयल से 12.9 बिलियन डॉलर में रिफाइनरी खरीदी थी। इस रिफाइनरी की क्षमता 20 मिलियन टन प्रतिवर्ष है। रोसनेफ्ट की इस वेंचर में 49.1 फीसदी हिस्सेदारी है। रिफाइनरी यूरोप और अफ्रीका को निर्यात पर निर्भर है क्योंकि भारत में इसके केवल 6,750 पेट्रोल पंप हैं। रूसी तेल से बने उत्पादों पर बैन लगने से निर्यात प्रभावित हो सकता है, जिससे कामकाज और नौकरियों पर खतरा हो सकता है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रोसनेफ्ट ने नायरा में अपनी हिस्सेदारी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड को बेचने के लिए बातचीत शुरू की थी, लेकिन 20 बिलियन डॉलर की कीमत एक समस्या बन रही थी। नई कीमत बाजार के हिसाब से तय की जाएगी क्योंकि कम कीमतों के कारण मौजूदा कीमत कम प्रभावी हो गई है।