भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां होने वाले चुनाव लोकतांत्रिक मूल्यों की जीवंतता और शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण माने जाते हैं। एक बार फिर देश में चुनावी महापर्व का शंखनाद हो चुका है। पांच राज्यों पश्चिम बंगाल तमिलनाडु असम केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इन चुनावों को केवल राज्यों की सरकार तय करने वाली प्रक्रिया नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और दशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।
नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग ने चुनाव कार्यक्रम का विस्तृत विवरण जारी किया। घोषित कार्यक्रम के अनुसार पश्चिम बंगाल में दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होगा और मतगणना 4 मई को होगी। तमिलनाडु में 23 अप्रैल को एक चरण में मतदान होगा जबकि असम केरल और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को मतदान कराया जाएगा। इन सभी राज्यों के चुनाव परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे। चुनाव आयोग के अनुसार इस बार लगभग 7.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे और लगभग 2.18 लाख मतदान केंद्र बनाए गए हैं। अकेले पश्चिम बंगाल में ही 80 हजार से अधिक मतदान केंद्र स्थापित किए गए हैं। यह आंकड़े भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की विशालता और संगठन क्षमता को दर्शाते हैं। भारत में होने वाले चुनाव केवल राष्ट्रीय घटना नहीं होते बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी इन पर गहरी नजर रहती है। यही कारण है कि इन चुनावों को चुनावी महाकुंभ की संज्ञा दी जा रही है।
इन चुनावों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय दलों के बीच राजनीतिक शक्ति संतुलन की परीक्षा है। पश्चिम बंगाल तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में लंबे समय से क्षेत्रीय दलों का मजबूत वर्चस्व रहा है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ दल अभी तक इन राज्यों में स्थायी रूप से सत्ता स्थापित नहीं कर पाया है। इसके विपरीत असम में भाजपा पहले से सत्ता में है और तीसरी बार सरकार बनाने की कोशिश कर रही है। वहीं पुडुचेरी में भी दूसरी बार सरकार बनाने की रणनीति बनाई जा रही है। पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार सबसे अधिक चर्चा में है। राज्य की राजनीति पिछले डेढ़ दशक से ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के इर्दगिर्द घूमती रही है। वर्ष 2011 से लगातार सत्ता में रहने के कारण इस बार उनके सामने सत्ता विरोधी माहौल की चुनौती भी है। यदि ममता बनर्जी चौथी बार मुख्यमंत्री बनने में सफल होती हैं तो यह भारतीय राजनीति में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। दूसरी ओर भाजपा सोनार बांग्ला के नारे के साथ अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। असम में भाजपा के सामने सत्ता बरकरार रखने की चुनौती है। 126 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा पिछले कुछ वर्षों में संगठन को काफी मजबूत कर चुकी है। हालांकि विपक्षी दल भी गठबंधन बनाकर चुनावी मुकाबले को रोचक बनाने का प्रयास कर रहे हैं। पूर्वोत्तर भारत में भाजपा की राजनीतिक पकड़ के लिहाज से यह चुनाव काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। केरल भारतीय राजनीति का एक अनूठा उदाहरण है जहां सत्ता अक्सर दो प्रमुख गठबंधनों के बीच बदलती रहती है। राज्य की राजनीति में वामपंथी दलों और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का लंबे समय से प्रभाव बना हुआ है। यहां भाजपा अभी तक सत्ता के करीब नहीं पहुंच सकी है लेकिन संगठन विस्तार के माध्यम से अपनी उपस्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रही है।
तमिलनाडु में इस बार चुनाव और भी रोचक हो गया है। 234 सीटों वाली विधानसभा में परंपरागत रूप से द्रविड़ मुनेत्र कषगम और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम के बीच मुकाबला होता रहा है। वर्तमान में स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके सत्ता में है और वह अपनी सरकार को बनाए रखने का प्रयास कर रही है। इस बार अभिनेता विजय के राजनीति में प्रवेश ने चुनावी समीकरणों को नई दिशा दे दी है। उनकी पार्टी तमिलेगा वेत्री कषगम का गठन तमिलनाडु की राजनीति में एक नया अध्याय माना जा रहा है।
पुडुचेरी भले ही आकार में छोटा राज्य है लेकिन राजनीतिक दृष्टि से उसका चुनाव भी महत्वपूर्ण है। 30 सीटों वाली विधानसभा में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलता है। छोटे राज्यों के चुनाव अक्सर बड़े राजनीतिक संकेत देते हैं और पुडुचेरी का चुनाव भी उसी श्रेणी में रखा जा सकता है। इन चुनावों में लगभग 7.4 करोड़ मतदाताओं की भागीदारी भारत की लोकतांत्रिक शक्ति का बड़ा उदाहरण है। चुनाव आयोग लगातार मतदाता जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को मतदान के लिए प्रेरित कर रहा है। हालांकि मतदाता सूची को लेकर कुछ विवाद भी सामने आए हैं। एसआईआर प्रक्रिया के तहत कई नाम हटाए जाने पर विपक्षी दलों ने चिंता व्यक्त की है जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को अद्यतन और पारदर्शी बनाना आवश्यक है। हर चुनाव की तरह इस बार भी विभिन्न दल अपने अपने मुद्दों के साथ मैदान में उतर रहे हैं। कहीं विकास और कल्याणकारी योजनाओं को प्रमुख मुद्दा बनाया जा रहा है तो कहीं पहचान की राजनीति और क्षेत्रीय अस्मिता को। पश्चिम बंगाल में नागरिकता और पहचान से जुड़े मुद्दे चर्चा में हैं। तमिलनाडु में क्षेत्रीय गौरव और सामाजिक न्याय की राजनीति प्रमुख भूमिका निभा सकती है। केरल में वैचारिक राजनीति और विकास मॉडल महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जबकि असम में राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास की राजनीति चुनावी विमर्श के केंद्र में है।