संसद में हंगामा और वास्तविक मुद्दों से भटकती राजनीति

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं है बल्कि वह राष्ट्रीय चिंतन और जनभावनाओं का सर्वोच्च मंच भी है। यहां होने वाली बहसें और निर्णय देश की नीतियों की दिशा तय करते हैं। इसलिए जब संसद में गंभीर विषयों पर विचार के बजाय लगातार हंगामा और टकराव की स्थिति बनती है तो यह लोकतंत्र की सेहत के लिए चिंता का विषय बन जाता है। हाल ही में संसद के दोनों सदनों में जो दृश्य देखने को मिला उसने इस चिंता को और गहरा कर दिया। विपक्ष ने मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष को लेकर सदन में जोरदार हंगामा किया और इस मुद्दे पर तत्काल चर्चा की मांग की। वास्तव में मध्य पूर्व में चल रहा तनाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक प्रभाव वाला मुद्दा है। अमेरिका इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता टकराव अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में इस विषय पर संसद में चर्चा की मांग को पूरी तरह अनुचित नहीं कहा जा सकता।

लेकिन जिस तरीके से इस मुद्दे को उठाया गया उसने चर्चा की गंभीरता को कमजोर कर दिया। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही नारेबाजी और विरोध के कारण कामकाज बाधित हो गया और कुछ ही मिनटों में कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। बाद में जब विदेश मंत्री एस जयशंकर सरकार का पक्ष रखने के लिए खड़े हुए तब भी विपक्ष का विरोध जारी रहा। विपक्ष का कहना था कि मंत्री के बयान से पहले विस्तृत चर्चा होनी चाहिए जबकि सरकार का तर्क था कि पहले मंत्री का वक्तव्य सुना जाए और उसके बाद चर्चा की जा सकती है। इस टकराव के बीच पूरा दिन बिना किसी सार्थक बहस के गुजर गया।

इस पूरे घटनाक्रम में एक और पहलू भी सामने आया। विपक्ष ने पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था। संसदीय परंपरा के अनुसार ऐसे प्रस्ताव को सदन में प्रस्तुत किया जाना चाहिए ताकि उस पर चर्चा हो सके। लेकिन जब पीठासीन अधिकारी जगदम्बिका पाल ने विपक्ष से प्रस्ताव पेश करने को कहा तो विपक्ष ने ऐसा नहीं किया और हंगामा जारी रखा। इससे यह संदेश गया कि विपक्ष स्वयं अपनी रणनीति को लेकर स्पष्ट नहीं है।

निस्संदेह अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का असर भारत पर पड़ सकता है। भारत के लाखों नागरिक खाड़ी देशों में कार्यरत हैं और तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव से देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। लेकिन यह भी एक यथार्थ है कि अमेरिका और ईरान जैसे शक्तिशाली देशों के बीच चल रहे संघर्ष को भारत अपने स्तर पर रोक नहीं सकता। भारत कूटनीतिक स्तर पर शांति की अपील और संतुलित भूमिका जरूर निभा सकता है परंतु किसी अंतरराष्ट्रीय युद्ध को रोक देना उसके हाथ में नहीं होता।

संसद का समय अत्यंत मूल्यवान होता है। सभापति ने यह भी याद दिलाया कि संसद के प्रत्येक मिनट पर जनता के लाखों रुपये खर्च होते हैं। जब सदन का समय हंगामे में नष्ट होता है तो उसका नुकसान केवल सरकार या विपक्ष को नहीं बल्कि पूरे देश को होता है। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनकर संसद भेजती है ताकि वे उनकी समस्याओं को उठाएं और समाधान की दिशा में गंभीर चर्चा करें। आज देश के सामने अनेक महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं जिन पर संसद में गंभीर बहस की आवश्यकता है। बेरोजगारी महंगाई आर्थिक असमानता कृषि संकट शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्याएं सीधे आम नागरिक के जीवन को प्रभावित करती हैं।

यदि इन मुद्दों पर रचनात्मक चर्चा हो तो संसद वास्तव में लोकतांत्रिक समाधान का मंच बन सकती है। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि सत्ता और विपक्ष दोनों मिलकर राष्ट्रीय हित में काम करें। असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है लेकिन असहमति का अर्थ केवल विरोध नहीं बल्कि सार्थक संवाद भी होता है। यदि संसद में हर मुद्दा केवल आरोप प्रत्यारोप और हंगामे तक सीमित रह जाएगा तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल अल्पकालिक राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर संसद की गरिमा को प्राथमिकता दें। जब संसद में गंभीर और जिम्मेदार बहस होगी तभी जनता का विश्वास मजबूत होगा और लोकतंत्र की वास्तविक भावना भी कायम रह सकेगी।