मोदी का इजरायल दौरा: बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच रणनीतिक संतुलन

प्रधानमंत्री का दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया गहरे अस्थिर दौर से गुजर रहा है। संघर्ष, गाज़ा की मानवीय त्रासदी और क्षेत्रीय ध्रुवीकरण ने वैश्विक राजनीति को नई दिशा दी है। ऐसे में भारत की कूटनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—रणनीतिक हितों और नैतिक संतुलन के बीच सही रास्ता चुनना। भारत और इजरायल के संबंध पिछले एक दशक में अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा और तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग निरंतर बढ़ा है। इजरायल भारत का एक प्रमुख रक्षा साझेदार है, वहीं स्टार्टअप और नवाचार के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच घनिष्ठ तालमेल बना है। प्रधानमंत्री का यह दौरा इन संबंधों को और गहराई देने का अवसर है।

हालांकि, भारत की विदेश नीति केवल एक ध्रुव पर आधारित नहीं रही है। भारत ने परंपरागत रूप से इजरायल के अधिकारों का समर्थन किया है और ‘दो-राष्ट्र समाधान’ की वकालत की है। इसलिए यह दौरा भारत की उस संतुलित नीति की भी परीक्षा है । वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत एक उभरती शक्ति के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना चाहता है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या पश्चिम एशिया का संकट—भारत ने किसी गुट में खुलकर शामिल होने के बजाय ‘रणनीतिक स्वायत्तताÓ का मार्ग चुना है। यह दौरा भी उसी नीति की निरंतरता माना जा सकता है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत के भीतर एक बड़ा मुस्लिम समुदाय है और पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय कामगार कार्यरत हैं। ऐसे में सरकार को हर कदम सोच-समझकर उठाना होगा, ताकि घरेलू सामाजिक सद्भाव और विदेशों में बसे भारतीयों की सुरक्षा प्रभावित न हो।

अंतत यह दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की वैश्विक भूमिका की परीक्षा भी है। क्या भारत पश्चिम एशिया में शांति और संवाद का सेतु बन सकता है? क्या वह विकास और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन कायम रख पाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में स्पष्ट होंगे। फिलहाल, उम्मीद यही है कि यह यात्रा भारत की कूटनीतिक परिपक्वता और दूरदर्शिता को और मजबूती देगी। दौरा केवल एक औपचारिक राजनयिक यात्रा नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत की प्राथमिकताओं का स्पष्ट संकेत है। पश्चिम एशिया इस समय तनाव, युद्ध और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में भारत का हर कदम वैश्विक मंच पर उसकी छवि और भूमिका को प्रभावित करता है।

भारत और इजरायल के रिश्ते आज रक्षा सहयोग, खुफिया साझेदारी, कृषि तकनीक, जल प्रबंधन और साइबर सुरक्षा तक फैल चुके हैं। ड्रोन, मिसाइल प्रणाली और आधुनिक रक्षा उपकरणों के क्षेत्र में इजरायल भारत का एक विश्वसनीय साझेदार रहा है। “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसे अभियानों में भी इजरायली तकनीक और निवेश की अहम भूमिका हो सकती है।

लेकिन इस दौरे का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत संयुक्त राष्ट्र में दो-राष्ट्र समाधान की वकालत करता आया है। वर्तमान में गाज़ा में जारी हिंसा और मानवीय संकट के बीच भारत को अपनी कूटनीति में संतुलन बनाए रखना होगा। एक ओर रणनीतिक हित हैं, तो दूसरी ओर मानवीय मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रतिबद्धता। भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ रहा है—न तो किसी एक गुट के साथ पूरी तरह खड़ा होना, न ही अपने दीर्घकालिक हितों से समझौता करना। यदि भारत शांति, संवाद और पुनर्निर्माण की पहल में रचनात्मक भूमिका निभा पाता है, तो उसकी वैश्विक साख और मजबूत होगी।

घरेलू स्तर पर भी यह दौरा संदेश देता है कि भारत सुरक्षा और विकास को प्राथमिकता देता है, लेकिन साथ ही बहुलतावादी समाज और सामाजिक सद्भाव की जिम्मेदारी को भी समझता है। पश्चिम एशिया में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा और हित भी सरकार की प्राथमिकता में शामिल हैं। अंतत:, यह यात्रा केवल द्विपक्षीय समझौतों तक सीमित नहीं रहेगी। यह तय करेगी कि भारत 21वीं सदी की जटिल कूटनीति में किस तरह अपने हितों, सिद्धांतों और वैश्विक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन स्थापित करता है। उम्मीद है कि यह दौरा भारत की परिपक्व और बहुआयामी विदेश नीति को नई दिशा देगा।