रिश्तों का मौन संकट: ‘वाइफ स्वैपिंग’ और टूटते सामाजिक मूल्य

कुछ विषय ऐसे होते हैं, जिन पर लिखना केवल शब्दों का अभ्यास नहीं होता, बल्कि सामाजिक, मानसिक और नैतिक साहस की परीक्षा भी होता है। यह विषय भी उन्हीं में से एक है। यहाँ चुनौती सिर्फ़ अभिव्यक्ति की नहीं, बल्कि उस सच को सामने लाने की है, जिसे समाज अक्सर संस्कृति की आड़ में या आधुनिकता के नाम पर ढक देना चाहता है।

आज जब भारतीय समाज में परिवार की पवित्र संस्था गहरे संकट से गुजर रही है, ‘वाइफ स्वैपिंग’ जैसी प्रवृत्ति न केवल वैवाहिक बंधनों को चुनौती दे रही है, बल्कि हमारे सामाजिक मूल्यों को भी झकझोर रही है। यह कोई सनसनीखेज़ विषय नहीं, बल्कि उस मौन गिरावट का संकेत है, जिसे हम अनदेखा करते आ रहे हैं।

अक्सर यह मान लिया जाता है कि ‘वाइफ स्वैपिंग’ पश्चिमी संस्कृति या बड़े महानगरों तक सीमित समस्या है। यह धारणा हमें एक झूठा आत्मसंतोष देती है। लेकिन उत्तर प्रदेश, केरल और लद्दाख जैसे क्षेत्रों से सामने आए मामले इस भ्रम को तोड़ते हैं। यह प्रवृत्ति अब केवल शहरी अपार्टमेंट्स तक सीमित नहीं रही, बल्कि गाँवों और छोटे कस्बों की चुप्पी में भी अपनी जगह बना चुकी है—बस हम उसे देखना नहीं चाहते।

यह मुद्दा केवल शारीरिक इच्छा या तथाकथित आधुनिकता का नहीं है। यह भावनात्मक असुरक्षा, संवादहीनता, मानसिक अधूरापन और सामाजिक पाखंड का परिणाम है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसमें विश्वास का पूर्ण विघटन, ईर्ष्या, भावनात्मक शोषण और रिश्तों का वस्तुकरण शामिल है। सामान्य दिखने वाले परिवार कब ऐसे कुचक्र में फँस जाते हैं, जहाँ भावनाओं की जगह समझौते और दिखावे ले लेते हैं—यह समझना आज बेहद ज़रूरी हो गया है। बैंगलोर और हापुड़ जैसे स्थानों से आए मामले इस सच्चाई की पुष्टि करते हैं।
सोशल मीडिया और इंटरनेट ने जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बढ़ाई है, वहीं मूल्यों के क्षरण को भी आसान बना दिया है। आभासी दुनिया में जो व्यवहार “सामान्य” दिखता है, वही वास्तविक जीवन में परिवारों की नींव हिला देता है। आईटी क्रांति, उपभोक्तावादी संस्कृति और पश्चिमी प्रभाव ने युवा वर्ग में प्रयोग की होड़ बढ़ाई है। इसके साथ आर्थिक असमानता, संयुक्त परिवार का विघटन और कई मामलों में महिलाओं की आर्थिक निर्भरता इस प्रवृत्ति को और गहराती है।
भारतीय संदर्भ में यह समस्या एक पुरुषप्रधान सामाजिक ढांचे से भी जुड़ी है। कई बार पत्नियाँ चुप रहती हैं—तलाक के सामाजिक कलंक, आर्थिक असुरक्षा और बच्चों के भविष्य के डर से। सोशल मीडिया ग्रुप्स और निजी नेटवर्क्स ने इसे संगठित स्वरूप दिया है खासकर टियर-2 शहरों में तकनीक-साक्षर युवा वर्ग इसके दायरे में आ रहा है।
इसके प्रभाव दूरगामी और विनाशकारी हैं। वैवाहिक स्तर पर विश्वास टूटता है भावनात्मक लगाव बिखरता है और रिश्ते खोखले हो जाते हैं। बच्चों पर इसका असर लंबे समय तक रहता है—वे अस्थिरता, असुरक्षा और रिश्तों के प्रति अविश्वास सीखते हैं। विस्तारित परिवार सहयोग से पीछे हटने लगता है और समाज स्तर पर नैतिक क्षरण तथा महिलाओं के शोषण को बढ़ावा मिलता है।
यह विमर्श केवल समस्या की ओर उँगली नहीं उठाता, बल्कि समाधान की दिशा भी सुझाता है। परिवार स्तर पर खुला संवाद, काउंसलिंग और भावनात्मक अंतरंगता आवश्यक है। समाज स्तर पर नैतिक शिक्षा, रिश्तों की समझ और महिलाओं का सशक्तिकरण ज़रूरी है। कानूनी स्तर पर मौजूदा धाराओं का प्रभावी उपयोग और परिवार परामर्श से जुड़ी नीतियों को मज़बूत करना होगा।
यह विषय अश्लीलता नहीं, बल्कि समाज का आईना है। यह पाठक को असहज करता है—और शायद इसी असहजता में इसका सबसे बड़ा सामाजिक महत्व निहित है। अब समय है कि हम अपने रिश्तों को नए सिरे से नहीं, बल्कि सही अर्थों में पुनः परिभाषित करें।
चुप्पी अब समाधान नहीं है। समय है जागने का।

-डॉ. प्रियंका सौरभ