शिक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल और युवाओं का बढ़ता आक्रोश

देश की सबसे बड़ी ताकत उसका युवा वर्ग होता है। यही युवा किसी भी राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करते हैं। लेकिन जब यही युवा बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों और व्यवस्था की उदासीनता का शिकार होने लगें तो स्वाभाविक रूप से असंतोष और आक्रोश जन्म लेता है। आज देश में कुछ ऐसा ही वातावरण दिखाई दे रहा है।

हाल के दिनों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने लाखों छात्रों और अभ्यर्थियों की मेहनत पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। वर्षों तक कठिन परिश्रम करने वाले युवा जब परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर ही संदेह करने लगें तो उनका विश्वास व्यवस्था से उठना स्वाभाविक है। यही कारण है कि दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश के अनेक हिस्सों तक छात्रों और युवाओं ने विरोध प्रदर्शन कर अपनी नाराजगी व्यक्त की है।

युवाओं की चिंता केवल एक परीक्षा या एक भर्ती तक सीमित नहीं है। उनके सामने सबसे बड़ा प्रश्न अपने भविष्य का है। लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा, सीमित रोजगार अवसर और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी पहले से ही युवाओं को परेशान कर रही है। ऐसे में यदि परीक्षा प्रणाली पर भी सवाल उठने लगें तो उनका मनोबल टूटना स्वाभाविक है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में युवाओं की आवाज को गंभीरता से सुना जाना चाहिए क्योंकि यही वर्ग देश के विकास का आधार है।

हाल में देश के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी को लेकर भी व्यापक विवाद देखने को मिला। यद्यपि बाद में स्पष्टीकरण दिया गया कि उनका आशय युवाओं से नहीं था, फिर भी यह प्रकरण इस बात का संकेत है कि युवा वर्ग अपने सम्मान और भविष्य से जुड़े मुद्दों को लेकर पहले से अधिक संवेदनशील हो चुका है। सोशल मीडिया के दौर में ऐसी प्रतिक्रियाएं तेजी से फैलती हैं और जनभावनाओं को प्रभावित करती हैं।

दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी अनेक बहसें जारी हैं। पाठ्यक्रमों में बदलाव, शिक्षा के निजीकरण और सरकारी विद्यालयों की स्थिति जैसे विषय लगातार चर्चा में बने हुए हैं। चिंता का विषय यह है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आज भी बड़ी संख्या में गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों की पहुंच से दूर होती जा रही है। महंगी होती शिक्षा और बढ़ती व्यावसायिकता ने समान अवसर की अवधारणा को चुनौती दी है।

शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय विकास का आधार होती है। इसलिए सरकारों की प्राथमिकता ऐसी व्यवस्था विकसित करना होनी चाहिए जिसमें परीक्षाएं निष्पक्ष हों, भर्ती प्रक्रियाएं समयबद्ध हों और युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप अवसर प्राप्त हों। साथ ही शिक्षा संस्थानों को राजनीतिक और वैचारिक विवादों से ऊपर उठाकर ज्ञान, शोध और कौशल विकास के केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

आज आवश्यकता युवाओं को उपदेश देने की नहीं बल्कि उनकी समस्याओं के समाधान की है। देश का युवा अवसर चाहता है, सम्मान चाहता है और अपनी मेहनत का उचित परिणाम चाहता है। यदि शिक्षा और रोजगार से जुड़े प्रश्नों का समय रहते समाधान नहीं किया गया तो असंतोष और अविश्वास की यह खाई और गहरी हो सकती है। एक विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब देश का युवा स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और आश्वस्त महसूस करेगा।