चारधाम हवाई सेवा पर उठते सवाल

चारधाम यात्रा में 17 वर्षों के दौरान 15 हेलीकॉप्टर हादसों और 46 मौतों के आंकड़े किसी सामान्य दुर्घटना का विवरण नहीं, बल्कि हमारी विमानन सुरक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा गंभीर सवाल हैं। आस्था और श्रद्धा के साथ देवभूमि पहुंचने वाले यात्रियों की सुरक्षा यदि बार-बार खतरे में पड़ रही है, तो केवल हादसों पर दुख जताना और जांच के आदेश देना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि इन दुर्घटनाओं से सबक लेकर व्यवस्था में स्थायी सुधार कब होगा और जिम्मेदारी तय करने की ठोस पहल कब दिखाई देगी? चारधाम यात्रा उत्तराखंड की आस्था, पर्यटन और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। बुजुर्गों, महिलाओं और कठिन पहाड़ी रास्तों पर चलने में असमर्थ श्रद्धालुओं के लिए हेलीकॉप्टर सेवा बड़ी राहत है। लेकिन सुविधा तभी सार्थक है, जब यात्रियों की सुरक्षा सर्वोपरि हो। खराब मौसम, कम दृश्यता, तकनीकी खामियों और संचालन संबंधी चूकों के बीच उड़ानों की अनुमति देना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। पहाड़ों में मौसम पलभर में बदलता है, इसलिए उड़ान संबंधी फैसले सामान्य पूर्वानुमान नहीं, बल्कि सटीक तकनीकी आकलन और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर होने चाहिए।

बदरीनाथ में हालिया हेलीकॉप्टर दुर्घटना ने उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण (यूकाडा) की भूमिका और उड़ानों के संचालन संबंधी निर्णयों पर फिर सवाल खड़े किए हैं। यदि मौसम के कारण उड़ानें रोकी गई थीं और बाद में दोबारा शुरू की गईं, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि परिस्थितियों में क्या बदलाव आया था और उड़ान की अनुमति किस तकनीकी आधार पर दी गई। मौसम संबंधी चेतावनी के बावजूद संचालन का निर्णय हुआ हो, तो उसकी निष्पक्ष समीक्षा जरूरी है। हालांकि, जांच से पहले किसी संस्था या अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना अनिवार्य है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा जांच के आदेश देना स्वागतयोग्य है, लेकिन जांच का दायरा केवल हालिया हादसे के तात्कालिक कारणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पिछले 17 वर्षों की दुर्घटनाओं का तुलनात्मक अध्ययन कर यह पता लगाया जाए कि हादसों के पीछे मौसम, तकनीकी खराबी, मानवीय चूक या संचालन संबंधी कमियों की कितनी भूमिका रही। पूर्व जांचों में दिए गए सुझावों पर कितना अमल हुआ और सुरक्षा मानकों की निगरानी कितनी प्रभावी रही, इसका भी आकलन होना चाहिए। सरकार को उड़ानों की अनुमति और रोकने के लिए स्पष्ट, पारदर्शी तथा विशेषज्ञ आधारित मानक लागू करने चाहिए। मौसम का तकनीकी सत्यापन, निर्णयों का लिखित रिकॉर्ड, हेलीकॉप्टर कंपनियों के सुरक्षा मानकों की नियमित समीक्षा और पायलटों को समय पर मौसम संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। किसी भी स्तर पर संदेह की स्थिति में उड़ान रोकने को प्राथमिकता मिले। यात्रियों की सुविधा के नाम पर जोखिम उठाना किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच की जिम्मेदारी केवल पायलट या हेलीकॉप्टर कंपनी तक सीमित न रहे। यदि कहीं लापरवाही या निर्धारित मानकों की अनदेखी सामने आती है, तो उड़ान संचालन, निगरानी, अनुमति और प्रशासनिक नियंत्रण से जुड़े प्रत्येक स्तर की भूमिका की जांच होनी चाहिए। दोष सिद्ध होने पर संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं की जवाबदेही तय हो तथा सुधारात्मक कदमों की प्रगति भी सार्वजनिक की जाए। चारधाम यात्रा की वास्तविक सफलता श्रद्धालुओं के दर्शन करने के साथ सुरक्षित घर लौटने में है। 17 वर्षों में 15 हादसे और 46 मौतें व्यवस्था से जवाब मांग रही हैं। सरकार के सामने चुनौती केवल अगली दुर्घटना को लेकर जांच बैठाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें दुर्घटनाओं की आशंका कम से कम हो और सुरक्षा मानकों से समझौता करने की गुंजाइश न बचे। आस्था के इस कठिन सफर में श्रद्धालुओं की जान किसी भी सुविधा, समयबद्धता या व्यावसायिक हित से अधिक मूल्यवान है। सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए और जवाबदेही केवल घोषणा नहीं, व्यवस्था का स्थायी सिद्धांत बननी चाहिए।