वैश्विक राजनीति में किसी देश की वास्तविक ताकत उसकी आर्थिक क्षमता, कूटनीतिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की इच्छाशक्ति से तय होती है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां एक बार फिर इस सच्चाई को सामने लाती हैं कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्थायी मित्रता से अधिक महत्व आर्थिक और रणनीतिक हितों का होता है। रूस से तेल खरीदने के मामले में भारत पर दबाव बनाने से लेकर ऊर्जा बाजार में अपने हित साधने तक, अमेरिका का रुख यही संकेत देता है कि वह अपने फायदे के लिए नीतियों में बदलाव करने से भी नहीं हिचकता। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह वैश्विक शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय स्वाभिमान को किस तरह सुरक्षित रखे। भारत दुनिया के प्रमुख तेल आयातक देशों में शामिल है और उसकी ऊर्जा सुरक्षा का सीधा संबंध आम आदमी की जेब, महंगाई तथा देश की आर्थिक गति से है। रूस, वेनेजुएला और पश्चिम एशिया से कच्चे तेल की खरीद भारत की जरूरतों के अनुसार तय होनी चाहिए। यदि सस्ता तेल देश की अर्थव्यवस्था को राहत देता है, तो उसे केवल किसी दूसरे देश के राजनीतिक दबाव के कारण छोड़ना उचित नहीं होगा। यही सिद्धांत अमेरिका पर भी लागू होना चाहिए। यदि वह अपने आर्थिक हितों के लिए विभिन्न देशों से ऊर्जा संसाधन खरीदता है और दूसरे देशों के साथ व्यापारिक समझौते करता है, तो भारत को भी अपने हितों के अनुरूप निर्णय लेने का पूरा अधिकार है।
गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज की विशाल तेल रिफाइनरी इस संदर्भ में भारत की औद्योगिक क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण है। कच्चे तेल को परिष्कृत कर विभिन्न प्रकार के ईंधन में बदलने और उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की क्षमता भारत को वैश्विक ऊर्जा व्यापार में विशेष स्थान दिलाती है। अमेरिका यदि भारत की इस क्षमता को अपने ऊर्जा संकट या घरेलू राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में उपयोगी मानता है, तो यह भारत के औद्योगिक कौशल की पहचान है। लेकिन इस क्षमता का लाभ उठाने वाले किसी भी समझौते में भारत के आर्थिक हित, ऊर्जा जरूरतें और व्यापारिक शर्तें सर्वोपरि रहनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका का व्यवहार अक्सर उसके घरेलू राजनीतिक समीकरणों से भी प्रभावित होता है। तेल की कीमतों में वृद्धि अमेरिकी उपभोक्ताओं को प्रभावित करती है और इसका असर वहां की राजनीतिक बहस पर भी पड़ता है। ऐसे में अमेरिका यदि भारत की रिफाइनिंग क्षमता को अपने बाजार के लिए उपयोगी मानता है, तो उसे भारत के साथ समानता और पारस्परिक लाभ के आधार पर सहयोग करना चाहिए। भारत को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी औद्योगिक ताकत किसी दूसरे देश की राजनीतिक जरूरतों को पूरा करने का माध्यम भर बनकर न रह जाए। भारत-अमेरिका संबंधों का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान के साथ अमेरिका के रिश्ते हैं। आतंकवाद के मुद्दे पर भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अपनी चिंताएं रखता रहा है। पाकिस्तान की भूमिका को लेकर भारत की सुरक्षा संबंधी आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अमेरिका यदि रणनीतिक और भौगोलिक कारणों से पाकिस्तान के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है, तो यह उसका निर्णय हो सकता है, लेकिन भारत की अपेक्षा स्वाभाविक है कि आतंकवाद के प्रश्न पर दोहरे मानदंड न अपनाए जाएं। आतंकवाद के विरुद्ध किसी भी देश की प्रतिबद्धता उसके बयानों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और ठोस कार्रवाई से आंकी जानी चाहिए। इसी प्रकार भारत और ईरान के संबंधों को पाकिस्तान के साथ अमेरिका के रिश्तों के समान मानकर देखना भी उचित नहीं है। प्रत्येक देश के साथ भारत के संबंधों का अपना ऐतिहासिक, आर्थिक और सामरिक आधार है। ईरान के साथ संपर्क भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और व्यापारिक संभावनाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा है। इसलिए भारत की विदेश नीति का आकलन किसी तीसरे देश की सुविधा के अनुसार नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर होना चाहिए।
रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भी भारत को स्पष्ट और दृढ़ रुख अपनाने की आवश्यकता है। किसी देश को व्यापारिक निर्णयों के लिए दंडात्मक शुल्क की धमकी देना और फिर अपने हित बदलने पर उसी नीति में नरमी दिखाना अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता पैदा करता है। भारत को ऐसे दबावों के सामने अपनी आर्थिक और कूटनीतिक क्षमता का इस्तेमाल करना चाहिए। ऊर्जा के स्रोतों में विविधता, मजबूत घरेलू रिफाइनिंग व्यवस्था और संतुलित व्यापारिक संबंध ही देश को बाहरी दबावों से बचा सकते हैं।
भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंध मजबूत करने चाहिए, लेकिन मित्रता और निर्भरता के बीच का अंतर भी समझना होगा। मजबूत साझेदारी वही होती है, जिसमें दोनों पक्ष एक-दूसरे की संप्रभुता, सुरक्षा चिंताओं और आर्थिक हितों का सम्मान करें। किसी एक देश के साथ निकटता के कारण दूसरे महत्वपूर्ण साझेदारों से संबंध कमजोर करना या घरेलू उद्योगों की क्षमता का उपयोग असंतुलित शर्तों पर होने देना दूरगामी नुकसान का कारण बन सकता है। आज भारत के सामने अवसर भी बड़ा है और चुनौती भी। विशाल बाजार, कुशल उद्योग, बढ़ती अर्थव्यवस्था और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति देश को वैश्विक मंच पर प्रभावशाली भूमिका निभाने की क्षमता देते हैं।