-डा. जयंतीलाल भंडारी-
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में एमएस स्वामीनाथन शताब्दी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि भारत अपने किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं कि व्यक्तिगत रूप से मुझे बहुत बड़ी कीमत चुकाना पड़ेगी, लेकिन मैं इसके लिए तैयार हूं। ज्ञातव्य है कि अमेरिकी डेयरी उत्पादों और आनुवांशिक रूप से संवर्धित (जीएम) फसलों के लिए बाजार पहुंच पर मतभेद के मद्देनजर भारत और अमेरिका के बीच एक अगस्त की निर्धारित समय सीमा में अंतरिम व्यापार समझौता नहीं हो पाया है। ऐसे में जहां 7 अगस्त से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप के द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर 25 फीसदी शुल्क (टैरिफ) लागू कर दिया है, वहीं 27 अगस्त से भारत पर रूस से तेल खरीदी के मद्देनजर जुर्माने के रूप में 25 फीसदी का अतिरिक्त शुल्क लगाने का कार्यकारी आदेश भी जारी किया है। भारत अब ब्राजील के साथ सबसे ज्यादा 50 फीसदी अमेरिकी टैरिफ वाला देश बन गया है। चीन को अमेरिका का सबसे बड़ा शत्रु बताने वाले ट्रंप ने चीन पर महज 30 फीसदी टैरिफ लगाया है। जहां पाकिस्तान पर 19 फीसदी टैरिफ है, वहीं भारत के निर्यात प्रतिस्पर्धी एशियाई देशों पर भी कम टैरिफ है। ऐसे में जहां चालू वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के लिए 900 अरब डॉलर के रिकॉर्ड निर्यात के लक्ष्य को प्राप्त किए जाने की चुनौती बढ़ गई है, वहीं देश की 6.5 फीसदी अनुमानित विकास दर के घटकर 6 फीसदी के स्तर पर पहुंचने की चुनौती भी बढ़ गई है।
अब ट्रंप की टैरिफ चुनौती का मुकाबला करने के लिए नई रणनीति के तहत किसानों और निर्यातकों को सब्सिडी, घरेलू खपत को बढ़ाना, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) की मजबूती, स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत अभियान को जन-जन तक पहुंच, मुक्त व्यापार समझौतों में तेजी के विशेष अभियानों के साथ आगे बढऩा होगा। अब इस रणनीति पर देरी करने का कोई विकल्प भारत के पास नहीं है। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत और अमेरिका के बीच कारोबार तेजी से बढऩे की जो ऊंची संभावनाएं दिखाई दे रही थी, वे ट्रंप के द्वारा भारत पर ऊंचे टैरिफ और रूसी तेल की खरीदी पर जुर्माने के आदेश ने धूमिल कर दी हैं। वस्तुत: इस समय अमेरिका और भारत के बीच अंतरिम व्यापार समझौते पर अंतिम दौर की चर्चा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देशों के तहत भारत के चर्चाकारों के द्वारा देश के करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़े हुए कृषि और डेरी क्षेत्र में रियायत नहीं देने की दृढ़ता दिखाई जाने से अमेरिका ने भारत पर दबाव बढ़ाने के मद्देनजर ऊंचे टैरिफ का ऐलान किया है। यद्यपि भारत की अर्थव्यवस्था निर्यात प्रधान अर्थव्यवस्था नहीं है और अर्थव्यवस्था में मजबूत घरेलू बाजार एक बड़ी शक्ति है, फिर भी अब भारत को अमेरिकी बाजारों के लिए निर्यात के साथ-साथ वैश्विक व्यापार में चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। ज्ञातव्य है कि अमेरिका भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार और निर्यात गंतव्य है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने अमेरिका को 86.5 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया। इस दौरान अमेरिका के साथ भारत का व्यापार अधिशेष 40.8 अरब डॉलर रहा। ऐसे में ट्रंप के द्वारा लगाए गए ऊंचे टैरिफ के मद्देनजर भारत के कई उद्योग-कारोबार प्रभावित होंगे। मसलन, ऑटो कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियां, टेक्सटाइल्स इंडस्ट्री, मेटल और फार्मा कंपनीज पर ट्रंप के टैरिफ का असर देखने को मिल सकता है।
स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि ट्रंप के ऊंचे टैरिफ से विकास दर और निर्यात घटने की चुनौतियों का सामना करने और हरसंभव तरीके से निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार ने रणनीतिपूर्वक आगे बढऩा शुरू किया है। नई रणनीति के तहत वाणिज्य मंत्रालय ने इस्पात, लेदर, रत्न, खाद्य प्रसंस्करण, विद्युत और यांत्रिक मशीनरी, इंजीनियरिंग, समुद्री और कृषि सहित कई क्षेत्रों के निर्यातकों के साथ बैठकें की हैं, ताकि उच्च शुल्क के कारण उन्हें होने वाली समस्याओं को समझा जा सके और उन्हें ब्राजील की तरह राहत दी जा सके। निर्यातक सरकार से वित्तीय सहायता, किफायती ऋण, ब्याज सब्सिडी चाहते हैं। निर्यातक निर्यातित उत्पादों पर शुल्कों एवं करों की छूट (आरओडीटीईपी) और राज्य एवं केंद्रीय करों व शुल्क की छूट (आरओएससीटीएल) जैसी योजनाओं के तहत बकाया राशि का समय पर भुगतान और अमेरिका के लिए सीधे निर्यात जैसे राजकोषीय प्रोत्साहनों का विस्तार करने की जरूरत अनुभव कर रहे हैं। निश्चित रूप से अब भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को और बहिर्मुखी बनाना होगा। भारत की तेजी के साथ की डगर पर तेजी के साथ बढऩा होगा। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि भारत के मुक्त व्यापार समझौते भारत की वैश्विक व्यापार उपस्थिति को नया रूप देते हुए दिखाई दे रहे हैं।
भारत के द्वारा ईए्रफटीए, यूएई, ऑस्ट्रेलिया और यूके के साथ किए गए एफटीए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। भारत को यूएई और ऑस्ट्रेलिया के साथ एफटीए से मजबूत लाभ हुआ है। यूएई के साथ, पिछले चार-पांच वर्षों में सेवाओं का निर्यात लगभग दोगुना हो गया है। यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत और ब्रिटेन के बीच बहुप्रतीक्षित एफटीए पर 24 जुलाई को दोनों देशों के द्वारा हस्ताक्षर किए गए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यह भी उल्लेखनीय है कि पिछले माह 10 जुलाई को भारत में स्विटजरलैंड की राजदूत माया तिस्साफी ने कहा कि भारत और 4 सदस्य देशों आइसलैंड, स्विटजरलैंड, नॉर्वे और लिकटेंस्टीन वाले यूरोपिटन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (ईएफटीए) के बीच व्यापार समझौता अक्टूबर 2025 से लागू हो जाएगा। इन सबके साथ-साथ इन दिनों भारत-आसियान के बीच मौजूदा व्यापार समझौते की समीक्षा के लिए आसियान के साथ चर्चा जारी है। आसियान में ब्रनोई, कांबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं। भारत के द्वारा यूरोपीय आयोग, ओमान, कतर, न्यूजीलैंड, पेरू, चिली, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, इजराइल, भारत गल्फ कंट्रीज काउंसिल सहित अन्य देशों के साथ भी एफटीए को शीघ्रतापूर्वक अंतिम रूप देने की डगर पर आगे बढ़ रहा है।
भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया के जीवंत आर्थिक क्षेत्र से फिर से जुडऩा होगा। साथ ही पूर्व के अपने पड़ोसियों के साथ आर्थिक जुड़ाव का रास्ता दोबारा तैयार करना होगा। इन सबके साथ-साथ भारत को व्यापक एवं प्रगतिशील प्रशांत पार साझेदारी (सीपीटीपी) का हिस्सा बनने के लिए आगे बढऩा होगा। इस परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री मोदी ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत करते हुए दिखाई दे रहे हैं। मोदी इसी महीने के अंत में एससीओ सम्मेलन में हिस्सा लेने चीन की यात्रा पर जाएंगे। यह जरूरी है कि अब ट्रंप के ऊंचे टैरिफ की चुनौती के बीच निर्यातकों के समक्ष शुल्क के अलावा जो नॉन टैरिफ बाधाएं हैं, उन्हें दूर किया जाए। इसके अलावा भी चीन सहित अन्य देशों में निर्यात बढ़ाने के मद्देनजर कई ऐसे बड़े कदमों की आवश्यकता है, जिनसे भारतीय निर्यातकों को प्रोत्साहन मिल सके। लंबे समय से लंबित इनवर्टेड टैक्स स्ट्रक्चर और जीएसटी सुधार काफी जरूरी हैं। जीएसटी दरों में भी कमी करने की जरूरत है। नि:संदेह सरकार को ध्यान देना होगा कि कल तक पूरी दुनिया में भारत का सेवा निर्यात तेज रफ्तार से बढ़ रहा था, जो अब सुस्त है।